पझौता किसान आंदोलन – सिरमौर (हि.प्र.)
पझौता किसान आंदोलन : 1942-43 ई. में सिरमौर के ऊपरी क्षेत्र पझौता के लोगों ने अपनी शिकायतों को लेकर एक किसान आंदोलन चलाया। इस आंदोलन के पीछे विभिन्न कारण रहे। इस समय दूसरा विश्वयुद्ध (1939-45) जोरों पर था। उधर बंगाल में अकाल पड़ा हुआ था। अन्न की कमी अनुभव हो रही थी इसलिये रियासती सरकार ने किसानों पर रियासत से बाहर अनाज भेजने पर रोक लगा दी जहां उन्हें बेचने पर अच्छे मूल्य मिलते। दूसरे यह आदेश कर दिये कि किसान लोग अपने पास थोड़ा अन्न रखें और शेष अन्न सरकारी को-आपरेटिव सोसाइटियों में बेच दें। आलू का भाव सोलह रुपये प्रति मन होते हुये भी किसानों को आलू तीन रूपये प्रति मन की दर से राज्य कोआपरेटिव सोसाइटियों को देने के कड़े आदेश दिये।
घराट, रीत विवाह आदि अनुचित कर लगाये गए । कर्मचारी लोगों से अधिक बेगार लेने लगे और कई बार वे उनसे घी, अन्न आदि भी लेते थे । लोग इस तरह के आदेशों से परेशान हो गए। इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए लोग पझौता के ‘गांव टपरौली ‘में अक्टूबर 1942 को एकत्रित हुये। उन्होंने वहां पहली बैठक की और “पझौता किसान सभा” का गठन किया।
इस बैठक में आन्दोलन के लिये सभी जाति वर्ग एवं धर्मो के लोगों को संगठित करने पर बल दिया गया । इसके प्रधान लक्ष्मी सिंह गांव कोटला तथा सचिव वैद्य सूरत सिंह कटोगड़ा चुने गये । इसके अतिरिक्त टपरोली गांव के मियां गुलाब सिंह और अतर सिंह, जदोल के चूं चूं मियां, पेणकुफर के मेहर सिंह, धामला के मदन सिंह बघोह के जालम सिंह, नेरी के कलीराम शांवगी आदि-आदि। कुछ समय के पश्चात् लक्ष्मी सिंह प्रधान को इस संगठन से निकाल कर उनके स्थान पर धामला गांव के मदन सिंह को प्रधान बना दिया गया।
इस आन्दोलन का समूचा नियंत्रण व संचालन वैद्य सूरत सिंह के अधीन था । उसने राजा राजेन्द्र प्रकाश से पत्र द्वारा अनुरोध किया कि वह स्वयं लोगों की स्थिति जानने के लिये इलाके का दौरा करें तथा नौकरशाही द्वारा लोगों से दुर्व्यवहार, रिश्वतखोरी व झूठे मुकदमे बनाकर परेशान करने तथा बेगार बन्द करने आदि अनेकों मांगों पर ध्यान दें।
लोग चाहते थे कि राजा अपनी आंखों से प्रजा के दुख-दर्द सुनने व देखने के लिये स्वयं आये। तत्कालीन सिरमौर नरेश राजेन्द्र प्रकाश के कर्मचारियों ने चापलूसी करके राजा को लोगों से मिलने नहीं दिया। अत: मांगों पर विचार करने के बदले आन्दोलन को दबाने तथा उसके मुख्य संचालकों को पकड़ने के लिये रामस्वरूप पुलिस अधिकारी के संचालन में पुलिस गांव धामला, हाब्बन भेजी गई। वह आन्दोलन को दबा न सका।
इसके पश्चात् समुचा पझौता क्षेत्र सैनिक शासन के अधीन कर दिया गया। दो मास तक लोग बराबर ‘मार्शल ला’ के अधीन भी आन्दोलन करते रहे। आन्दोलनकारी कलीराम का मकान जला दिया गया ओर वैद्य सरत सिंह के मकान को डाईनामाइट से उड़ा दिया गया। कमना नाम के एक व्यक्ति की गोली लगने से मृत्यु हो गई।
दो मास के पश्चात् सैनिक शासन और गोलीकाण्ड के बाद सेना और पुलिस ने आन्दोलनकारियों में मुख्य व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया, जिन की संख्या 69 थी। कुछ लोगों ने भाग कर रियासत जुब्बल में शरण ली। नाहन में एक ट्रिब्यूनल बैठाकर आन्दोलनकारियों पर मुकदमें चलाये गये इनमें से 14 को बरी कर दिया गया, तीन को दो-दो बर्ष का और 52 को आजन्म कारावास का दण्ड सुनाया गया । बाद में इसे दस और पाँच वर्षों में परिवर्तित कर दिया गया। दस वर्ष केंद की श्रेणी का में वैद्यसूरत सिंह, मियां गुलाब सिंह, अमर सिंह,मदन सिंह कालीराम आदि थे। सबसे बाद में कैद से वैद्य सूरत सिंह, बस्तीराम पहाड़ी, चेत सिंह वर्मा को मार्च 1948 में छोड़ा गया।
पझौता किसान आंदोलन – सिरमौर (हि.प्र.)
इसे भी पढ़ें : धामी गोली कांड
- HPPSC Shimla All Latest Notification -December 2025

- HPU Shimla All Latest Notifications -December 2025

- SSC Constable (GD) And Rifleman (GD) Recruitment 2026

- HPRCA Hamirpur Special Educator, JOA (Library) And Steno-Typist Recruitment 2026

- HPU Shimla All Latest Notifications -November 2025
