Brief History of District Kullu in Hindi – HP

Brief History of District Kullu in Hindi – HP

कुल्लू की वंशावली के आधार पर कुल्लू राज्य के संस्थापक का नाम विहंगमणी पाल था। लोक कथाओं में कुल्लू घाटी को कुलांतपीठ कहा गया है क्योंकि इसे रहने योग्य संसार का अंत माना गया था। कुल्लू को देव भूमि भी कहा जाता है।

कुल्लू रियासत के स्त्रोत-

  • कुल्लू के पौराणिक ग्रन्थों रामायण, विष्णुपुराण, कादम्बरी, महाभारत, मार्कडेण्य पुराण, वृहत्संहिता और कल्हण की राजतरंगिणी में ‘कुल्लूत’ का वर्णन मिलता है।
  • वैदिक साहित्य में कूलुत देश को गन्धर्वो की भूमि कहा गया है।
  • कुल्लू रियासत की वंशावली ए.पी.एफ. हारकोर्ट की पुस्तक ‘कुल्लू व लाहौल-स्पीति’ में दी गई है।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 635 ई. में कुल्लू रियासत की यात्रा की।
  • उन्होंने कुल्लू रियासत की परिधि 800 कि.मी. बताई जो जालंधर से 187 कि.मी. दूर स्थित था। उसके अनुसार कुल्लू रियासत में लगभग एक हजार बौद्ध भिक्षु महायान का अध्ययन करते थे।भगवान बुद्ध के कुल्लू भ्रमण की याद में अशोक ने कुल्लू में बौद्ध स्तूप बनवाया। सलारी पत्थर लेख कुल्लू से गुप्त शासक चन्द्रगुप्त के बारे में जानकारी मिलती है।

कुल्लू रियासत की सात वजीरियाँ:

  1. परोल वजीरी (कुल्लू शहर)।
  2. वजीरी रूपी (पार्वत और सैंज खड्ड के बीच) (कनावर क्षेत्र)।
  3. वजीरी लग महाराज (सरवरी और सुल्तानपुर से बजौरा तक)।
  4. वजीरी भंगाल (छोटा बंगाहल क्षेत्र)।
  5. वजीरी लाहौल।
  6. वजीरी लग सारी (फोजल और सरवरी खड्ड के बीच)।
  7. वजीरी सिराज (सिराज को जालौरी दर्रा दो भागों में बाँटता है)।

विहंगमणी पाल :

कुल्लू की वंशावली के आधार पर कुल्लू राज्य के संस्थापक का नाम विहंगमणी पाल था। इसके पूर्वज पहले प्रयाग में रहते थे। वहां से वे कुमाऊं आए और कुमाऊं से मायापुरी (हरिद्वार)। परन्तु स्थानीय सामन्तों के विरोध के कारण उन्हें वह स्थान भी छोड़ना पड़ा। विहंगमणी पाल अपने भाईयों से विदाई लेकर अपनी पत्नी, पुत्र पछपाल, और कुल पुरोहित उदयराम के साथ कुल्लू घाटी की ओर आया। सबसे पहले वह मनीकर्ण गया।

उस समय कुल्लू छोटे-छोटे गढ़ों में विभाजित था। इन गढ़ों पर छोटे-छोटे सामंत शासन करते थे। ये सामन्त, राणा और ठाकुर कहलाते थे। उसने पार्वती घाटी के कुछ एक सामन्तों से युद्ध करके उन्हें अपने अधीन कर लिया, परन्तु उसकी यह विजय स्थायी न रह सकी और सामन्तों ने फिर संगठित होकर उससे विजित भाग छीन लिए और उसे वहां से भागने पर विवश होना पड़ा। उसने जगतसुख में आकर चपराई राम नामक व्यक्ति के घर में जाकर शरण ली तथा इस प्रकार अज्ञात वास करने लगा। विहंगमणिपाल ने रियासत की पहली राजधानी (नास्त) जगतसुख स्थापित की।

विहंगमणिपाल के पुत्र पच्छपाल ने ‘गजन’ और ‘बेवला’ के राजा को हराया। पछ्पाल के बाद हिनपाल, सुर्गपाल, शक्तिपाल , महेश्वर पाल (महेंद्र पाल ) और ओमपाल राजा हुए। यह त्रिगर्त के बाद दूसरी सबसे पुरानो रियासत है।

राजेन्द्रपाल

  • ओमपाल के बाद उसका पुत्र राजेंद्र पाल राजा हुआ।
  • उस समय जगत सुख, नग्गर और मध्य भाग कोठी वरसाई में गजा के सामंत सुरतचंद का राज्य था।
  • राजेन्दर पाल ने उससे कर माँगा। बाद में कर देने पर उनके बीच युद्ध हुआ।

विशुदपाल :

  • विशुदपाल अपने पिता के बाद जब राजा बना तो उसने नग्गर के सामंत कर्मचंद के साथ युद्ध छेड़ा।
  • युद्ध में करमचंद मारा गया। विशुदपाल (राजेन्द्रपाल का पुत्र) ने कुल्लू की राजधानी जगतसुख से नग्गर स्थानांतरित की।
  • विशुद पाल के बाद उत्तमपाल , द्विज पाल , चक्र पाल , कर्ण पाल, रक्ष पाल राजा हुए।

रूद्रपाल :

  • रूद्रपाल के समय स्पिति के राजा राजेन्द्र सेन ने कुल्लू पर आक्रमण कर उसे कर देने पर बाध्य किया।
  • चम्बा ने भी कुल्लू से लाहौल क्षेत्र छीन लिया।
  • रुद्रपाल के बाद उसका पुत्र हमीर पाल स्पीति को कर देता रहा।

प्रसिद्धपाल :

  • रुद्रपाल के पोते प्रसिद्धपाल ने स्पिति के राजा चेतमेन को हराया।
  • उसने लाहौल को भी चम्बा रियासत से आजाद करवा लिया।
  • प्रसिद्ध पाल के बाद हरिचंद पाल , सुभत पाल, सोम पाल, संसार पाल ,भोग पाल ,विभय पाल, गणेश पाल , गंभीर पाल , भूमि पाल राजा हुए।

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भूमि पाल :

  • भूमि पाल के सबंध में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है।
  • भूमिपाल के उपरांत उसका पुत्र श्री दतेश्वर पाल गद्दी पर बैठा।

दत्तेश्वर पाल (700 ई) :

  • दत्तेश्वर पाल के समय चम्बा के राजा मेरूवर्मन (680-700 ई.) ने कुल्लू पर आक्रमण कर दत्तेश्वर पाल को हराया।
  • वह इस युद्ध में मारा गया।
  • दत्तेश्वर पाल पालवंश का 31वाँ राजा था उसके समय दिल्ली का राजा गोवेर्धन था।
  • उसके बाद उसके पुत्र अमरपाल ने सेना का नेतृत्व किया।
  • परन्तु युद्ध में वह और उसका पुत्र दोनों मारे गए। सीतल पाल भागकर बुशहर में शरण ली।
  • चम्बा का कुल्लू पर 780 ई. तक अधिकार रहा।

जारेश्वर पाल (780-800 ई.) :

  • राजा जारेश्वर पाल ने बुशहर रियासत की सहायता से कुल्लू को चम्बा से मुक्त करवाया।
  • जारेश्वर पाल के सम्पय चम्बा का राजा लक्ष्मी वर्मन था।
  • राजा जारेश्वर पाल के बाद प्रकाश पाल, अचम्भा पाल, तपेश्वर पाल, परम पाल , नागेंद्र पाल राजा हुए।

नारदपाल :

  • वह चम्बा के राजा साहिल वर्मन का समकालीन था।
  • साहिल वर्मन की सेना कुल्लू पर आक्रमण करके मनाली तक बढ़ती गयी और मनाली के निकट मजनाकोट गांव तक पहुँची गयी।
  • वहाँ पर उसकी सेनाओं ने एक दुर्ग भी बनाया। यह संघर्ष चम्बा और कुल्लू में 12 वर्ष तक चलता रहा।
  • बाद में चम्बा की सेना कुल्लू से भाग गई।

भूपपाल :

  • कुल्लू के 43वें राजा भूपपाल, सुकेत राज्य के संस्थापक वीरसेन के समकालीन थे।
  • वीरसेन ने सिराज में भूपपाल को हराकर उसे बंदी बनाया।
  • लेकिन बाद में उसे इस शर्त पर छोड़ा दिया की वह सुकेत को राजकर दिया करे।

अनिरुद्ध पाल

  • भूपपाल के बाद उसका पुत्र अनिरुद्ध पाल भी सुकेत को राज्य कर देता रहा।

हेत पाल :

  • अनिरुद्ध पाल के पुत्र हेतपाल के समय में सुकेत का राजा विक्रम सेन था।
  • विक्रम सेन तीर्थ यात्रा पर चले गए और राज-काज अपने भाई त्रिविक्रम सेन को दे दिया।
  • विक्रम सेन के भाई त्रिविक्रम सेन ने हेतपाल की सहायता से सुकेत पर अपना अधिकार कर लिया।
  • जब बाद में विक्रम सेन को इसके बारे में पता चला तो क्योंथल के राजा की सहायता से त्रिविक्रम सेन और हेतपाल को युद्ध में मार दिया।

सूरत पाल /हाशिर पाल :

  • सूरत पाल के समय लक्ष्मण सेन कुल्लू के बजीरी रूपी , लागसारी और परोल के कुछ भाग पर आक्रमण करके उसे अपने अधीन कर लिया।

संतोष पाल (प्रथम) :

  • संतोष पाल जब राजा बना तो उसने लद्दाख के गयमूर और दूसरे भाग पर अधिकार कर लिया।

तेग पाल :

तेग पाल ने बलतिस्तान के शासक मोहम्मद खान को मारकर उसके पुत्र को राजकर देने पर बाध्य किया।

उचित पाल :

  • उचित पाल जब राजा बना तो उसने तिब्बत पर आक्रमण किया।
  • उसके बाद सिकंदर पाल राजा हुआ।

सिकंदर पाल :

  • सिकंदर पाल के समय तिब्बत के गयामूर और बाल्टीस्तान के शासकों ने मिलकर कुल्लू पर आक्रमण किया और सिकंदर पाल को उस समय पकड़ा जब वह अपने पिता का अग्निदाह संस्कार कर रहा था।
  • इसके बाद सरस पाल ,सहदेव पाल , महादेव पाल , निरती पाल , बैन पाल , हस्त पाल , गंभीर पाल , नरेंद्र पाल और नन्द पाल राजा हुए।

उर्दान पाल-(1418-1428 ई.) :

  • पालवंश के 72वें राजा उर्दान पाल ने जगतसुख में सध्या देवी का मंदिर बनवाया।
  • शिलालेख के अनुसार राजा का कार्यकाल 1418 ई. से 1428 ई. रहा।

कैलाश पाल (1428-1450 ई.) :

  • कुल्लू का अंतिम राजा था जिसके साथ ‘पाल’ उपाधि का प्रयोग हुआ।
  • संभवतः वह पालवंश का अंतिम राजा था।
  • कैलाश पाल 1450 ई तक राज करता रहा।
  • इसके पश्चात् लगभग 50 वर्षों तक कोई ‘पाल’ राजा नहीं हुआ।
  • इसके बाद कुल्लू पर छोटे-मोटे सामन्तो ,राणाओं और ठाकुरों का राज रहा।

सिद्ध पाल सिंह :

  • कैलाश पाल के बाद के 50 वर्षों के अधितकर समय में कुल्लू सुकेत रियासत के अधीन रहा।
  • वर्ष 1500 ई. में सिद्ध सिंह ने सिंह बदानी वंश की स्थापना की। उन्होंने जगतसुख को अपने राजधानी बनाया।

बहादुर सिंह (1532 ई.) :

  • सिद्ध सिंह के बाद उसका पुत्र बहादुर सिंह गद्दी पर बैठा।
  • वह सुकेत के राजा अर्जुन सेन का समकालीन था।
  • उसने वजीरी रूपी और सिराज के राणाओं और ठाकुरों को जीत कर (16वीं सदी में) अपने राज्य में मिला लिया।
  • बहादुर सिंह ने पकरसा में अपने लिए महल बनवाया।
  • मकरसा की स्थापना महाभारत के विदुर के पुत्र मकस ने की थी।
  • मकस का विवाह ‘तांदी’ राक्षस की बेटी से हुआ था। मकस का पालन-पोषण व्यास ऋषि ने किया था।
  • राज्य की राजधानी उस समय नागर थी।
  • बहादुर सिंह ने अपने पुत्र प्रताप सिंह का विवाह चम्बा के राजा गणेश वर्मन की बेटी से करवाया।
  • बहादुर सिंह के बाद प्रताप सिंह (1559-1575), परतब सिंह (1575-1608), पृथ्वी सिंह (1608-1635) और कल्याण सिंह (1635-1637) मुगलों के अधीन रहकर कुल्लू पर शासन कर रहे थे।

जगत सिंह (1637-72 ई.) :

  • जगत सिंह कुल्लू रियासत का सबसे शक्तिशाली राजा था।
  • इसने अपने राज्यकाल में कुल्लू की सीमाएं दूर -दूर तक बढ़ा ली थी।
  • जगत सिंह ने लग वजीरी और बाहरी सिराज पर कब्जा किया।
  • उन्होंने डुग्गी लग के जोगचंद और सुल्तानपुर के सुल्तानचंद (सुल्तानपुर का संस्थापक) को (1650-55) के बीच पराजित कर ‘लग” वजीरी पर कब्जा किया।
  • औरंगजेब उन्हें ‘कुल्लू का राजा’ कहते थे।
  • कुल्लू के राजा जगत सिंह ने 1640 ई. में दाराशिकोह के विरुद्ध विद्रोह किया तथा 1657 ई. में उसके फरमान को मानने से मना कर दिया था।

राजा जगतसिंह ने ‘टिप्परी’ के ब्राह्मण की आत्महत्या के दोष से मुक्त होने के लिए राजपाठ रघुनाथ जी को सौंप दिया। राजा जगत सिंह ने 1653 ई. में दामोदर दास (ब्राह्मण) से रघुनाथ जी की प्रतिमा अयोध्या से मंगवाकर स्थापित कर राजपाठ उन्हें सौंप दिया।

राजा जगत सिंह के समय से ही कुल्लू के ढालपुर मैदान पर कुल्लू का दशहरा मनाया जाता है। राजा जगत सिंह ने 1660 ई. में अपनी राजधानी नग्गर से सुल्तानपुर स्थानांतरित की। जगत सिंह ने 1660 ई. में रघुनाथ जी का मंदिर और महल का निर्माण करवाया था। कुल्लू में वैष्णव धर्म का प्रचार जगत सिंह के समय हुआ।

विधि सिंह (1672-88) :

  • विधि सिंह ने अपने राज्य की सीमाएं दूर -दूर तक बढ़ाई।
  • राजा विधि सिंह ने तिब्बत के विरुद्ध लड़ाई में मुगल सेना की सहायता की जिसके बदले उसे ऊपरी लाहौल का भाग मिल गया।
  • उसने चन्द्रभागा से तांदी के बीच का भाग भी चम्बा से वापिस ले लिया।
  • विधि सिंह ने बाहरी सिराज की धौल ,कोट कंडी और बरामगढ़ की कोठियों को बुशहर राज्य से जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।
  • 1688 ई. में विधि सिंह की मृत्यु हो गई।

मानसिंह (1688-1719) :

  • मान सिंह 1688 ई. में गद्दी पर बैठा। उसके काल में कुल्लू अत्यंत शक्तिशाली राज्य के रूप में उभर आया चूका था।
  • राजा मानसिंह ने मण्डी पर आक्रमण कर गुम्मा द्रंग (Drang) नमक की खानों पर 1700 ई. में कब्ज़ा जमाया।
  • उसने बंगाहल के राजा पृथ्वीपाल की मण्डी के राजा सिद्ध सेन द्वारा हत्या के बाद उसकी रानी की सहायता की और बीड के भाग पर अधिकार कर मण्डी की सेना को हराया।
  • लाहौल-स्पीति को अपने अधीन कर तिब्बत की सीमा लिंगटी नदी के साथ निर्धारित की उसने शांगरी को कुल्लू में मिला लिया तथा कोटगढ़, कुम्हारसेन, बलसन के राजाओं से कर वसूल किये।
  • उसने बाहरी सराज का ‘पन्द्रह बीस ‘ का भाग बुशहर से जीतकर वहाँ पर तीन किले पन्द्रह-बीस, दवको-पोचका व टांगुस्ता बनवाये।
  • राजा के शासनकाल में कुल्लू रियासत का क्षेत्रफल 10 हजार वर्ग मील हो गया।
  • वर्ष 1719 में कम्हारसेन के राजा ने बुशहर रियासत के साथ मिलकर धोखे से श्रीकोट में मानसिंह को मरवा दिया।

राजसिंह (1719-31) :

  • राजा राजसिंह के समय गुरु गोविंद सिंह जी ने कुल्लू की यात्रा कर मुगलों के विरुद्ध सहायता माँगी जिसे राजा ने अस्वीकार कर दिया।
  • इस राजा का कार्यकाल मात्र 2 वर्ष था।

जय सिंह (1731-1742) :

  • राजा जय सिंह के साथ ही कुल्लू राज्य का पतन आरंभ हुआ।
  • जय सिंह ने कालू नाम के बजीर को कुल्लू से निकाल दिया था।
  • राजा जय सिंह के समय मण्डी के राजा शमशेर सेन ने कुल्लू पर आक्रमण करके चाहौर इलाके पर कब्जा कर लिया।
  • जय सिंह अयोध्या में रघुनाथ मंदिर में रहने लगा (लाहौर के मुगल सूबेदार से डरकर) और उसने राज्य अपने चचेरे भाई टेडी सिंह को सौंप दिया।

टेढीसिंह (1742-67) :

  • टेढ़ी सिंह ने वैरागियों के साथ मिलकर अपने विरोधियों को मरवाया।
  • उसके शासनकाल में नर्तको और संन्यासी (जय सिंह का बहरूपिया) की बातों में आकर जनता ने विद्रोह किया।
  • टेढ़ी सिंह के कार्यकाल में घमण्ड चंद ने कुल्लू पर आक्रमण किया। इसी समय मुस्लिम कट्टरपंथियों ने बजौरा मंदिर की मूर्तियों को तोड़ा।
  • राजा टेढ़ी सिंह की वैध संतान नहीं थी।
  • दासी पुत्र (अवैध संतानों में सबसे बड़े) प्रीतम सिंह 1767 ई. में गद्दी पर बैठा।

प्रीतम सिंह (1767-1806) :

  • प्रीतम सिंह काँगड़ा के राजा संसार चंद, मण्डी के राजा शमशेर सेन और चम्बा के राजा राज सिंह का समकालीन राजा था।
  • उसके शासनकाल में चम्बा के राजा राजसिंह ने बीड़ बंगाहल पर अधिकार कर कुल्लू के वजीर भागचंद को बंदी बनाया जिसे राजा प्रीतम सिंह ने 15 हजार रुपये देकर छुड़वाया।
  • 1792 में संसार चंद ने मंडी से चाहौर का भाग जीत लिया और उसे कुल्लू को दे दिया। परन्तु बाद में उससे भी वापिस ले लिया और फिर मंडी को दे दिया।
  • 1806 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

विक्रम सिंह (1806-1816) :

  • 1806 में प्रीतम सिंह की मृत्यु के बाद विक्रम सिंह गद्दी पर बैठा।
  • उसके गद्दी पर बैठते ही मंडी के राजा ईश्वरी सेन ने कुल्लू से देयो गढ़ ,मस्तपुर और सारी के किले जीत कर वापिस ले लिए।
  • उसके शासनकाल में 1810 ई. में कुल्लू पूर पहला सिक्ख आक्रमण हुआ जिसका नेतृत्व सिक्ख दीवान मोहकम चद कर रहे थे।
  • विक्रम सिंह ने गोरखों को सांगरी क्षेत्र के लिए कर दिया। विक्रम सिंह का समकालीन काँगड़ा का राजा संसार चंद था।
  • संसार चंद ने भी कुल्लू राज्य से कर वसूला।

अजीत सिंह (1816-41) :

  • विक्रम सिंह की विवाहिता रानी की कोई संतान नहीं थी। अत: उसकी मृत्यु (1816 ई. में) के उपरान्त विक्रम सिंह की रखैल के पुत्र अजीत सिंह को गद्दी पर बताया गया।
  • राज तिलक की रस्म मंडी के राजा की ओर से उसके प्रतिनिधि ने अदा की।
  • राजा अजीत सिंह के समय 1820 ई. में विलियम मुरक्राफ्ट ने कुल्लू की यात्रा की। वह कुल्लू की यात्रा करने वाले पहले यूरोपीय यात्री थे।
  • अजीत सिंह के चाचा किशन सिंह ने काँगड़ा की मदद से कुल्लू पर आक्रमण किया।
  • राजा अजीत सिंह ने मण्डी की सहायता से किशन सिंह को पराजित कर बंदी बना लिया।
  • काबुल के अमीर शाहशुजा ने कुल्लू में शरण ली जिससे रणजीत सिंह नाराज हो गया और दण्ड स्वरूप 80 हजार रुपये की मांग की।
  • सन 1818 में कुल्लू ने स्पीति पर परिणी दर्रे की ओर से बजीर शोभा राम के भाई के नेतृत्व में आक्रमण किया।
  • कुल्लू सेना ने स्पीति घाटी के बौद्ध बिहारों को लूटों तथाभारी मात्रा में लूट का माल लेकर वापिस आई।
  • सन 1820 में कुल्लू राज्य में प्रवेश करने वाला मूरक्राफ्ट पहला यूरोपियन था, जब वह अपनी लद्दाख यात्रा पर था।
  • 1840 ई. में सिक्खों की एक सेना जनरल वंचूरा के नेतृत्व में मंडी पर आक्रमण करने के लिए भेजी गई।
  • कुल्लू रियासत 1840 से 1846 ई तक सिक्खों के अधीन रही।
  • सन 1841 में राजा अजीत सिंह की मृत्यु हुई।

अंग्रेजों का शासन :

1846 ई.में अंग्रजों और सिक्खों में पहला युद्ध हुआ। इसके उपरांत 9 मार्च, 1846 की सन्धि के परिणाम स्वरूप सिंध और सतलुज के मध्य पहाड़ी क्षेत्र अंग्रेजों के हाथ आया। कुल्लू का सारा भाग 1846 ई. में अंग्रेजों के अधिकार में आ गया। लाहौल -स्पीति को कुल्लू से मिलाया। कुल्लू को 1846 में काँगड़ा का उपमंडल बनाकर शामिल किया। कुल्लू उपमंडल का पहला सहायक उपायुक्त कैप्टन हेय था।

1852 ई. में ठाकुर सिंह की मृत्यु हो गई और ज्ञान सिंह उसका अवैध पुत्र उत्तराधिकारी बना। इस आधार पर अंग्रेजी सरकार ने उसकी पदवी “राजा” से बदलकर “राय ” कर दी और उसके राजनैतिक अधिकार समाप्त कर दिए।

स्पीति को 1862 में सिराज से निकालकर कुल्लू की तहसील बनाया। वर्ष 1863 में वायसराय लार्ड एल्गिन कुल्लू आने वाले प्रथम वायसराय थे। कुल्लू उपमंडल से अलग से अलग होकर लाहौल-स्पीति जिले का गठन 30 जून , 1960 ई. में हुआ।

1963 ई. में कुल्लू अलग जिला बना करउभरा तथा सन 1966 तक पंजाब प्रान्त का एक हिस्सा बन कर रहा। कुल्लू जिले का 1 नवंबर, 1966 ई. को पंजाब से हिमाचल प्रदेश में विलय हो गया।

Brief History of District Kullu in Hindi – HP

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