Brief History of District Solan -Himachal | सोलन जिला का इतिहास

Brief History of District Solan -Himachal | सोलन जिला का इतिहास

जिला सोलन शिमला की पहाड़ी रियासतों बाघल, मांगल, महलोग, कुठाड़, बेजा, कुनिहार, बघाट का हिस्सा है । 15 अप्रैल , 1948 ई. में इन 7 पहाड़ी रियासतों को मिलाकर सोलन और अर्की तहसील के गठन किया गया था। जो महासू जिले की तहसीलें थी। इन रियासतों के अलावा हिन्दूर (नालागढ़) रियासत को 1966 ई. में हिमाचल प्रदेश में (शिमला की तहसील के रूप में ) और 1972 ई. में सोलन जिले में मिलाया गया। जिला तत्कालीन महासू जिले के सोलन और अरकी तहसीलों और तत्कालीन शिमला जिले के कंडघाट और नालागढ़ के तहसीलों से बना था।

बाघल रियासत

इस रियासत के उत्तर में मांगल रियासत के पहाड़, पूर्व में धामी व कुनिहार की ठकुराई, दक्षिण में अंबाला के मैदानी इलाके तथा पश्चिम में नालागढ़ स्थित था। बाघल रियासत सतलुज की सहायक नदी गंभर की घाटी में स्थित है । इस ठकुराई के इतिहास और परंपरा के अनुसार बाघल की स्थापना उज्जैनन के पवार राजपूत अजय देव ने तेहरवीं शताब्दी के अंत या चौदहवीं शताब्दी के पहले दशक में की थी। अजय देव उज्जैन से आकर सैरी गांव में रहने लगा।

बाघल पर कभी हिन्दूर, कभी कहलूर और कभी सिरमौर की प्रभुसत्ता रही। बाघल पर अनेक शासकों ने शासन किया । जिन शासकों के बारे में सूचना मिलती है वे निम्नलिखित हैं :-

सभा चंद (1640-1770) :

सभा चंद ने 1643 ई. में अर्की को बसाया और बाघल रियासत की राजधानी बनाया। यह राणा कला प्रेमी था। उसने वहां पर अपने लिए सूंदर महल बनाये। इसके समय मे अर्की में चित्रकला का प्रारंभ हुआ।

पृथ्वी चंद 1670-1727) :

इस राजा ने भी अर्की के विकास के लिए बहुत रुचि ली।

मेहर चंद (1727-1743) :

मेहर चंद ने भी एक महल बनाया। इस राणा ने चित्रकला को काफी प्रोत्साहन दिया। अर्की कलम की मुख्य विशेषता तीखी नाक है जो राजसी परिवार की भी अपनी खूबी है।

भूप चंद (1743-1778) :

भूप चंद एक बहादुर राजा था। इन्होंने कहलूर और हिन्दूर के बीच कई लड़ाइयां लड़ी।

जगत सिंह (1778-1828) :

इसके शासनकाल में बाघल के राणाओं ने अपने नाम के साथ ‘चंद’ के स्थान पर ‘ सिंह’ जोड़ना आरम्भ किया। 1803 ई. से 1815 तक रियासत गोरखों के नियंत्रण में रही। अर्की गोरखों का मुख्यालय रहा। राणा जगत सिंह ने 7 वर्षों तक नालागढ़ रियासत में शरण ली। ब्रिटिश सरकार ने 1815 ई. में बाघल रियासत से गोरखों के नियंत्रण से हटाया।

शिव सरण सिंह (1828-1840) :

शिव सरण सिंह, राणा जगत सिंह का पुत्र था। इस राणा के समय संसार चंद के पुत्र अनिरुद्ध चंद ने सिक्ख युद्ध के भय से 1829 में अर्की में आकर शरण ली। राणा शिव सरण सिंह एक धर्मपरायण व्यक्ति था। उसने कई मंदिर बनवाये और ब्राह्मणों को दान दिया।

किशन सिंह (1840-1876 ई.) :

किशन सिंह को अर्की का निर्माता समझा जाता है। 1857 ई. के विद्रोह में राणा किशन सिंह ने अंग्रेजों की सहायता की। अंग्रेजो ने किशन सिंह को 1860 ई. में ‘राजा ‘ का खिताब दिया ।

किशन सिंह के बाद मोती सिंह, ध्यान सिंह, विक्रम सिंह, सुरेंद्र सिंह और राजेंद्र सिंह ने शासन किया।

राजेन्द्र सिंह (1945-1948 ई.) :

राजेन्द्र सिंह बाघल रियासत का अंतिम शासक था। बाघल रियासत के जगतगढ़ दुर्ग का आधुनिक नाम जतोग (शिमला) है।

बघाट रियासत

बघाट शिमला से 20 मील दक्षिण पश्चिम में स्थित तथा इसका विस्तार सोलन व स्पाटु तक बना हुआ था । सोलन शहर और कसौली बघाट रियासत का हिस्सा थे । बघाट का अर्थ है बहू घाट अर्थात बहुत से दर्रे /घाट । यह ठकुराई पिंजौर से उत्तर में गिरी की सहायक नदी अश्वनी और सतलुज की सहायक नदी गंभर के जल संभर में स्थित थी ।

बघाट की स्थापना दक्षिण के धरनगिरी से आए एक पनवार वंशीय राजपूत बसंत पाल ने की थी इस साहसी पुरुष का नाम हरीश चंद्र पाल भी मिलता है ।

बसंत पाल धारा नगरी से आकर जिस स्थान पर बसा उस स्थान का नाम उसने बसंतपुर रखा अब यह क्षेत्र बासी कहलाता है । उस समय यह क्षेत्र छोटे-छोटे सामंतों में जिन्हें मावी कहते हैं बंटा हुआ था बसंत पाल के पुत्र वक्ष्पाल ने बांसल भोचली और भरोली के परगनों को जीतकर अपने अधीन किया था।

निम्नलिखित कुछ बघाट के शासकों का विवरण है जिनके शासनकाल में विशेष घटनाएं घटित हुई :-

राणा महेंद्र सिंह :

राणा महेंद्र सिंह के समय मैं हिंदूर का राजा रामशरण सिंह था। कहलूर में महान चंद था जो 1778 इसवी में गद्दी पर बैठते समय 6 वर्ष का था । रामशरण सिंह ने गद्दी पर बैठने के पश्चात 1790 ई में कहलूर के साथ विवाद खड़ा कर दिया और बिलासपुर नगर को जला दिया इस स्थिति से लाभ उठाकर बघाट ने अपने आपको कहलुर के अधिपत्य से मुक्त करा दिया । 1839 ई. में राणा महेंद्र सिंह की निसंतान मृत्यु हो गई ।

राणा विजय सिंह :

राणा महेंद्र सिंह के बाद राणा विजय सिंह बघाट का शासक बना । इसी वर्ष (1842) सरकार ने बघाट के कसौली क्षेत्र को 5000 तथा ₹ 500 बार्षिक किराए पर छावनी के लिए विजय सिंह से ले लिया । 1849 में विजय सिंह की भी निःसंतान मृत्यु हो गई। सीधा उत्तराधिकारी न होने के कारण लार्ड डलहौजी ने 1849 में बघाट को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया।

उमेद सिंह :

राणा विजय सिंह के बाद उमेद सिंह को लार्ड कैनिंग ने बघाट की गद्दी पर बिठाया ।

दुर्गा सिंह (1911-1948) :

दिलीप सिंह का पुत्र दुर्गा सिंह 1911 ईस्वी में 11 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा । दुर्गा सिंह आखिरी राजा थे जिन्हें ‘राजा’ की उपाधि से अलंकृत किया गया था। सोलन बघाट के दरबार मे 26 जनवरी, 1948 ई को हिमाचल प्रदेश का नामकरण किया गया जिसकी अध्यक्षता राजा दुर्गा सिंह ने की।

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कुनिहार रियासत

कुनिहार की ठकुराई शिमला से थोड़ी दूर पश्चिम की ओर स्थिति थी । शिमला से लगभग 35 किलोमीटर पश्चिम में स्थित इस का कुल क्षेत्रफल 7 वर्ग मील था। कुनिहार की परंपरा के अनुसार इस ठकुराई की स्थापना जम्मू (अखनूर) से आए अभोज देव ने 1154 ई. में की थी। कुनिहार रियासत की राजधानी हाटकोटी थी।

केशव राय :

केशव राय एक दुर्बल और आलसी शासक था उसकी इस स्थिति से लाभ उठाकर बाघल ने कुनी नदी के पार क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। कुछ क्षेत्र पर क्योंथल ने अधिकार कर लिया ।

मगन देव :

दूसरी पहाड़ी रियासतों की तरह मूर्खों ने कुनिहार पर भी अधिकार कर लिया वे कुनिहार से कर वसूल करते रहे और उन्होंने वहां के ठाकुर मगन देव को राजगद्दी से हटाकर उसे जागीर दे दी। गोरखा युद्ध के पश्चात अंग्रेजी सरकार ने मगन देव को 4 सितंबर 1815 को एक सनद द्वारा कुनिहार के ठकुराई पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए वापस लौटा दी थी मगन देवकी 1816 में मृत्यु हो गई ।

हरदेव सिंह :

हरदेव सिंह कुनिहार रियासत के अंतिम शासक थे ।

कुठाड़ रियासत

हॉट रियासत की स्थापना किश्तवार से आए सूरत चंद ने की। 1815 ईस्वी से पूर्व कुठाड़ हिन्दूर और बिलासपुर की जागीर थी। गोरखा आक्रमण के समय कुठाड़ रियासत क्योंथल की जागीर थी । उस समय का शासक गोपाल संस्था जिसने गोरखा आक्रमण के समय मनीमाजरा में शरण ली। ब्रिटिश सरकार ने 1815 ईस्वी में कुठाड़ को गोरखा नियंत्रण से मुक्त करवाकर राणा भूप सिंह को सनद प्रदान की । क्योंथल के हिस्सा रहे सबाथू को बाद में कुठाड़ रियासत में मिला दिया गया। सबाथू किले का निर्माण गोरखों ने करवाया जिसमें 1816 ई. में ब्रिटिश सरकार ने पहली सैन्य चौकी स्थापित की।

बेजा रियासत

भेजा रियासत कुठाड़ के दक्षिण और महलोग के पश्चिम में स्थित थी। इसकी स्थापना दिल्ली के तंवर वंशीय राजा ढोल चंद ने की। बेजा रियासत बिलासपुर (कहलूर) के अधीन थी। 1790 ई में हैं हिन्दूर द्वारा कहलूर को हराने के बाद बेजा रियासत स्वतंत्र हो गई। जबकि जनश्रुति के अनुसार बेजा रियासत की स्थापना ढोलचंद के 43वें वंशज गर्व चंद ने की।

मानचन्द (1773-1817)

मानचंद 24वां शासक था। इसके समय गोरखों का आक्रमण हुआ था। 1815 में अंग्रेजों ने गोरखों को परास्त करके बेजा की ठकुराई मानचंद को लौटा दी। इसके बाद प्रताप चंद और फिर मान चंद शासक बना।

पूर्ण चंद (1905-1939):

पूर्ण चंद की बाल्यवस्था में शासन का काम चलाने के लिए एक काउंसिल बनाई गई जिसके सदस्य अमर सिंह, देवी सिंह, वजीर और बक्शी थे। 1921 में पूर्ण चंद को राज्य के अधिकार दे दिए गए।

लक्ष्मी चंद :

लक्ष्मीचंद बेजा रियासत की अंतिम शासक थे।15 अप्रैल 1948 को हिमाचल के अस्तित्व में आने पर बेजा सोलन तहसील जिला महासू का भाग बनाया गया। अब यह जिला सोलन का हिस्सा है।

मांगल रियासत :

मांगल की ठकुराई बिलासपुर के उत्तर में सतलुज के किनारे स्थित है। गोरखों के इस क्षेत्र में आने से पूर्व यह ठकुराई कहलूर के अधीन थी। मारवाड़ से आये एक अत्री राजपूत युवक ने केशलूर के राजा के पास सेना में सूबेदार की नौकरी की राजा ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसे मांगल की ठकुराई दे दी।गोरखा युद्ध के पश्चात अंग्रेज सरकार ने मांगल की जागीर राणा बहादुर सिंह को 20 दिसंबर 1815 की सनद द्वारा प्रदान की। इस सनद द्वारा बेगारी उपलब्ध करवाने की शर्त लगाई गई थी जो बाद में 72 रुपये वार्षिक कर के बदले माफ कर दी गई थी।

राणा बहादुर सिंह के बाद उसका पुत्र पृथ्वी सिंह गद्दी पर बैठा। राणा शिव सिंह मांगल रियासत के अंतिम शासक थे। 15 अप्रैल , 1948 ई. को अर्की तहसील में मिला दिया गया।

महलोग रियासत

महलोग की जागीर शिमला से दक्षिण में फैली पहाड़ियों में नालागढ़ और कुठाड़ के मध्य स्थित थी। महलोग रियासत की स्थापना अयोध्या से आए बीरचंद ने की थी। बीरचंद शुरू में पट्टा गांव में रहने लगे और उसे अपनी राजधानी बनाया। उत्तम चंद ने सिरमौर के राजा से हारने के बाद महलोग रियासत की राजधानी 1612 ई. में ‘कोट धारसी’ में स्थानांतरित की।

महलोग रियासत 1803 ई से 1815 ई तक गोरखों के नियंत्रण में थी। इस दौरान महलोग के शासक ठाकुर संसार चंद ने हंडूर के राजा राम शरण के यहां शरण ली ब्रिटिश सरकार ने 1815 ईस्वी में महलोग को गोरखा आक्रांताओं से स्वतंत्रता दिलाई और स्वतंत्र सनद प्रदान की ।

ब्रिटिश नियंत्रण : ठाकुर संसार चंद की 1849 ईस्वी में मृत्यु के बाद दिलीप चंद गद्दी पर बैठे। रघुनाथ चंद को ब्रिटिश सरकार ने राणा का खिताब प्रदान किया। रघुनाथ चंद के पुत्र दुर्गा सिंह को ब्रिटिश सरकार ने ‘ठाकुर’ का खिताब प्रदान किया । महलोग रियासत के अंतिम शासक ठाकुर नरेंद्र चंद थे ।

हंडूर (नालागढ़) रियासत

हिंदुर नालागढ़ राज्य सतलुज की सहायक नदी सिरसा नदी घाटी में स्थित था। इस राज्य का आधा भाग शिवालिक की पहाड़ियों में फैला हुआ था और आधा भाग साथ में लगती समतल भू-भाग में। हिंदुर -नालागढ़ रियासत की स्थापना 1100 के आसपास जयचंद ने की थी जो कहलूर के राजा कहाल चंद का बेटा था। हंडूर रियासत कहलूर रियासत की प्रशाखा थी ।

विजय चंद :

अजय चंद्र की मृत्यु के समय उसका एक पुत्र विजय चंद्र केवल चार मास का था। विजय चंद की बाल्यवस्था के समय उसकी मां ने राज्य का कार्यभार संभाला। इस समय रानी को कुछ विरोधियों का सामना करना पड़ा। ये वही कनैत लोग थे जिन्होंने हांडू ठाकुर के विरुद्ध भी बिद्रोह किया था। 1201 ई. में विजय चन्द की मृत्यु हो गई। इसके बाद धाम चंद और बेरंग चंद ने ने शासन किया । जिनके शासनकाल में कोई विशेष घटना नही घटी।

लक्ष्मण चन्द :

अपने पिता की मृत्यु के समय लक्ष्मण चंद की आयु केवल 11 वर्ष थी राजा के अवयस्क होने के कारण कुछ लोगों ने फिर विद्रोह कर दिया जब वह वयस्क हुआ तो उसने विद्रोह दबा दिया। इनके बाद उत्तम चन्द, जयमल चन्द, अमर चन्द राजा हुए।

आलम चंद :

आलम चंद्र दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक का समकालीन था । 1398 ई। तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया उस समय हंडूर रियासत का राजा आलम चंद था आलम चंद ने तैमूर लंग की मदद की थी। जिसके बदले तैमूर लंग ने उसके राज्य को हानि नहीं पहुंचाई । आलंचन्द के बाद उद्यम चंद राजा बना।

विक्रमचंद :

विक्रम चंद ने नालागढ़ शहर की स्थापना की। विक्रम चंद ने नालागढ़ को हिन्दूर रियासत की राजधानी बनाया।

नारायन चंद :

नारायण चन्द के पिता की जब मृत्यु हुई तो उस समय वह छोटी आयु का था। नूरपुर के राजा अपनी बेटी का विवाह नारायण चन्द से करना चाहता था। लेकिन उन्होंने मना कर दिया था। बाद में नूरपुर के राजा की बेटी का विवाह कहलूर के राजा से हुआ। नूरपुर के राजा ने कहलूर के राजा से हिंदुर पर आक्रमण करवाया। कहलूर से शांति बनाएं रखने के लिए हिंदुर के राजा नसतगढ़ का किला दे दिया।

रामचंद :

रामचंद बड़ा वस्तु कला प्रेमी था। उसने रामगढ़ के किले का निर्माण करवाया और रामशहर नगर को बसाया। बाद में राम शहर को अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया। रामचंद्र के राज्य काल में 1526 ई में बाबर ने दिल्ली पर अधिकार करके मुगल राज्य की नींव रखी। 1556 ई. में दिल्ली पर फिर से अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और संभवतः अकबर ने अन्य पहाड़ी राजाओं के साथ हिंदुर को भी अपने अधिपत्य में लिया होगा।

संसार चंद :

इस राजा ने नालागढ़ में एक बहुत सुंदर महल बनाया और एक प्राचीन सरोवर कला कुंड की मरम्मत करवाई।

धर्मचंद :

राजा संसार चंद के बाद उसका पुत्र धर्मचद गद्दी पर बैठा किस राजा ने लोगों से लिए जाने वाले राज कर को आधा से घटाकर के छटा हिसा कर दिया । इसके बाद हिम्मत चन्द, भूप चंद, मान चंद, गजे सिंह राजगद्दी पर बैठे।

राजा रामशरण सिंह :

राजा राम शरण ने संसार चंद का साथ दिया था। उन्होंने 1790 ई. में कहलूर रियासत को हराकर फतेहपुर, रतनपुर और बहादुरपुर किले छीन लिए थे। गोरखा आक्रमण के समय राजा राम शरण को 3 वर्षों तक रामशरण किले में छिपना पड़ा ।1804 ईस्वी में गोरखों ने रामशहर पर कब्जा कर लिया। राजा रामशरण संसार चन्द का घनिष्ठ मित्र था। राजा रामशरण ने डेविड ऑक्टरलोनी के साथ मिलकर हिन्दूर से 1814 ई में गोरख आक्रांताओं को निकाला। गोरखा सेनापति अमरसिंह थापा ने हिंदुर रियासत के मलौन किले में 15 मई 1815 ई को आत्मसमर्पण किया। राजा रामशरण की 1848 ई. में मृत्यु हो गई। इनके बाद राजा विजय सिंह, उग्र सिंह, ईश्वरी सिंह जोगेंद्र सिंह राजा बने।

राजा सुरेंदर सिंह:

जोगिंदर सिंह की मृत्यु के पश्चात जब सुरेंद्र सिंह राजा बना तो उसने कुछ समय पश्चात अंग्रेज सरकार से अनुमति लेकर पटियाला रियासत के साथ एक संधि की इसके द्वारा नालागढ़ का प्रशासन पटियाला के साथ मिलकर चलाने का तय किया। राजा सुरेंद्र के शासनकाल में नालागढ़ को पेप्सू(पंजाब) में मिला दिया गया। नालागढ़ को 1966 ई. में हिमाचल प्रदेश में मिलाया गया जो 1972 में सोलन जिले का हिस्सा बन।

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