Brief History of District Sirmaur -Himachal | सिरमौर जिला का इतिहास

Brief History of District Sirmaur -Himachal | सिरमौर जिला का इतिहास | Brief History of District Sirmaur -Himachal | सिरमौर जिला का इतिहास

यमुना तथा सतलुज नदियों के मध्य पहले पर्वतीय क्षेत्र में बुशहर के बाद सिरमौर का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्राचीन काल में यह राज्य दक्षिण में उत्तर प्रदेश के मैदानों से लेकर उत्तर में शतरंज की सहायक नदी नोगली तक और पूर्व में पिंजौर तक फैला हुआ था । परंतु मध्यकाल में इसकी सीमाएं सिकुड़ कर रह गई.

इसे भी पढ़ें : सिरमौर जिले की भौगोलिक स्थिति

Table of Contents

सिरमौर का नामकरण :

जिला सिरमौर के नामकरण के बारे में अलग-अलग मत पाए गए है।। एक मत के अनुसार यह जिला पहाड़ी रियासतों मे अपनी अहम् भूमिका रखने के कारण सभी जिलो का सिर का ताज था जिस कारण सिरमौर कहा गया था। एक मत यह भी हैं कि राजा शालिवाहन द्वितीय के पौत्र राजा रसालू के पुत्र सिरमौर के नाम पर इस जिले का नाम सिरमौर पड़ा। एक मत के अनुसार मौर्य साम्राज्य के शीर्ष पर स्थित होने के कारण इसे शिरमौर्य की संज्ञा दी गई जो कालांतर में सिरमौर बन गया।

सिरमौर रियासत की स्थापना :

रंजौर सिंह की पुस्तक ‘तारीख-ए-रियासत सिरमौर’ के अनुसार सिरमौर रियासत के प्राचीन नाम सुलोकिना था। इसकी स्थापना 1139 ई. में जैसलमेर के सालवाहन के पुत्र रसालू ने की थी। जिसकी राजधानी सिरमौरी ताल थी।

एक अन्य जनश्रुति के अनुसार राजा मदन सिंह ने जादू टोना करने वाली स्त्री को धोखा देकर गिरी नदी में मरवा दिया । उस स्त्री के शाप से से गिरी नदी की बाढ़ में रियायत वह गई और उसका कोई उत्तराधिकारी जीवित नही बचा जिसके बाद जैसलमेर के राजा सालवाहन द्वितीय ने अपने तीसरे पुत्र हाँसू और उसकी गर्भवति रानी को सिरमौर भेजा। हाँसू की रास्ते मे मृत्यु हो गई।उसकी गर्ववती रानी ने सिरमौरी ताल में वृक्ष के नीचे राजकु को जन्म दिया जिसका नाम पलासू रखा।

गजेटियर सिरमौर के अनुसार जैसलमेर के राजा उग्रसेन (सालवाहन द्वितीय) हरिद्वार तीर्थयात्रा पर आए। सिरमौर की गद्दी खाली देख उन्होंने अपने पुत्र शोभा रावल (सुभंश प्रकाश) को रियासत की स्थापना के लिए भेजा। सुभंश प्रकाश 1195 ई. में सिरमौर रियासत की स्थापना की और राजबन को सिरमौर की राजधानी बनाया।

सुभंश प्रकाश (1195-1199) :

सिरमौर पर अधिकार करने के पश्चात उसने ध्वस्त राजधानी सिरमौरी ताल के निकट राज वन को अपनी राजधानी बनाया है ।4 वर्ष राज्य करने के बाद 1199 ईस्वी में उसकी मृत्यु हो गई।

माहे प्रकाश (1199-1217) :

सुभंश प्रकाश की मृत्यु के बाद माहे प्रकाश राजा बने । राजा ने राज्य की भीतरी स्थिति को सुधारने तथा अपनी शक्ति को सुदृढ़ बनाने के पश्चात राज्य के विस्तार के उद्देश्य से पूर्व की ओर स्थित गढ़वाल पर आक्रमण किया और भागीरथी नदी तक बढ़ता चला गया। वहां उसने मालदा किला पर अधिकार किया और नदी के किनारे एक लक्ष्मी नारायण मंदिर बनवाया । मालदा किले का नाम उसने अपने नाम पर माहे देवल रखा।

उदित प्रकाश (1217-1227):

उदित प्रकाश ने 1217 ई. में राजधानी राजभवन से कल से में स्थानांतरित की । राजा ने अपने पुत्र कौल प्रकाश को राजपाट देकर स्वयं तीर्थ यात्रा पर चला गया।

कौल प्रकाश (1227-1239) :

कौल प्रकाश ने अपने राज्य की सीमाओं को बढ़ाने के लिए गिरी नदी के क्षेत्र जुब्बल, बलसन और थिरोच में एक अभियान चलाया और वहां के राणा और ठाकुरों से कर वसूल किया। कॉल प्रकाश ने 1235 ईस्वी में रजिया सुल्तान के विरोधी निजाम उल मुल्क को शरण दी थी।

सुमेर प्रकाश (1239-1248) :

तारीखें-ए-सिरमौर के अनुसार सुमेर प्रकाश ने ऊपरी गिरी नदी घाटी में स्थित रतेश के किले को जीतकर अपने अधिकार में ले लिया और कालसी से वह अपनी राजधानी रतेश ले आया।

सूरज प्रकाश :

सूरज प्रकाश जब गद्दी पर बैठा तो उसने फिर से कालसी को अपनी राजधानी बनाया। इस पर लोगों ने विद्रोह किया और राज प्रसाद पर आक्रमण कर दिया राजा की बहन ने इस विद्रोह को पूरे जोर से मुकाबला किया और अपने प्राणों की बलि दे दी। सूरज प्रकाश ने कालसी आकर विद्रोह को दबा दिया। उसने जुब्बल, बालसन, कुमारसेन, घुंड, सारी, ठियोग, रांवी और कोटगढ़ को अपने अधीन कर लगान वसूल किया। उसने अपने भाई कल्याण चंद को इस क्षेत्र का प्रबंधक बनाया। उसने कालसी को ही अपनी राजधानी बनाए रखा। सूरज प्रकाश के समय नसीरुद्दीन दिल्ली का सुल्तान था।

भक्त प्रकाश :

इस राजा के समय मैं दिल्ली पर फिरोजशाह तुगलक का शासन था। 1379 ईस्वी में फिरोजशाह तुगलक ने सिरमौर को अपनी जागीर बनाया और उससे कर वसूल किया इसके पश्चात वह तथा उसके उत्तराधिकारी शिकार खेलने के लिए जाते रहे ।1388 ईस्वी में फिरोज शाह के पुत्र मोहम्मद शाह का सुल्तान के बजीरों के साथ झगड़ा हो गया जिसके कारण मुहम्मद शाह ने सिरमौर की पहाड़ियों में जाकर शरण ली परंतु शाही सेना ने उसका भाभी पीछा किया ।इसके फलस्वरूप वह वहां से भागकर नगरकोट (कांगड़ा) चला गया।

जगत प्रकाश :

राजा जगत प्रकाश का कार्यकाल प्रशासनिक अव्यवस्था सरकारी तंत्र की असफलता के लिए जाना जाता है । इस स्थिति का लाभ उठाकर जुब्बल, बालसन, राबिंगढ़, कुमारसेन ने विद्रोह कर दिया तथा सिरमौर राज्य के नियंत्रण से अपने आप को मुक्त कर लिया 2 वर्ष शासन के उपरांत सन 1388 मैं राजा जगत प्रकाश की मृत्यु हो गई।

इसे भी पढ़ें : धामी गोली काण्ड

वीर प्रकाश :

वीर प्रकाश ने 12 जागीरों के राणा तथा ठाकुरों को दबाकर अपने अधीन कर लिया। इनमें जुब्बल, सारी और रावीं के नामों का उल्लेख मिलता है। उसने हाटकोटी को जो, इन तीनों राज्यों की सीमाएं मिलती है अपनी राजधानी बनाया । उसने वहां पब्बर नदी के किनारे पर दुर्गा के मंदिर और रविनगढ़ किला बनवाया।

नेकट प्रकाश :

नेकट प्रकाश ने रियासत की राजधानी गिरी नदी के किनारे स्थित “नेरी गांव” में स्थापित की।

गर्व प्रकाश :

गर्भ प्रकाश ने नेरी को छोड़कर रतेश के पास जागरी किला में रहना आरंभ किया। जागरी किले से राजा गर्व प्रकाश ने 18 वर्ष तक शासन किया तथा सन 1432 में गर्व प्रकाश की मृत्यु हो गई। रतेश इस समय जिला शिमला का हिस्सा है।

ब्रह्म प्रकाश :

ब्रह्म प्रकाश कोट को छोड़कर सिरमौर के पच्छाद क्षेत्र में स्थित देवठल को अपनी राजधानी बनाया। लेकिन पुराने गजेटियर के अनुसार ब्रह्म प्रकाश ने रतेश के ‘कोट’ और ‘गिजारी’ को अपनी राजधानी रखा था इसमें 14 वर्ष तक शासन किया तथा 1446 में इसकी मृत्यु हो गई। इसके उपरांत उसका पुत्र हंस प्रकाश गद्दी पर बैठा तथा 25 वर्ष शासन के उपरांत 1471 में उसकी मृत्यु हो गई।

धर्म प्रकाश (1538-1570):

धर्म प्रकाश ने रियासत की राजधानी देवठल से बदलकर पुनः कालसी में स्थापित की।

दीप प्रकाश (1570-1585) :

दीप प्रकाश के सिरमौर के त्रिलोकपुर में 1573 ई. में बाला सुंदरी का मंदिर बनवाया।

बुद्धि प्रकाश :

बुद्धि प्रकाश सन 1605 में गद्दी पर बैठा उसने अपनी राजधानी कालसी से स्थानांतरित कर राजपुर बनाई। बुद्धि प्रकाश की मृत्यु सन 1615 में 10 साल तक शासन करने के उपरांत हो गई। इसके बाद भक्त प्रकाश, उदय प्रकाश ने शासन किया।

कर्म प्रकाश :(1616-1630):

कर्म प्रकाश 6 वर्ष तक कालसी से राज्य करता रहा। 1621 ई. में वह शिकार खेलने के लिए नाहन की पहाड़ियों में गया। वहाँ उसकी भेंट बनवारी लाल साधु से हुई । उससे प्रभावित होकर राजा ने नाहन में ही रहना आरंभ कर दिया और इस स्थान को अपनी राजधानी के रूप में विकसित करने लगा। यहां पर कर्म प्रकाश ने 8 वर्ष तक राज किया। कर्म प्रकाश ने नाहन शहर और नाहन किले की नींव रखी।

मन्धाता प्रकाश (1630-1654) :

मन्धाता प्रकाश मुगल सम्राट शाहजहां का समकालीन था। इस के समय शाहजहां के आठवें राज वर्ष (1634-35) में कांगड़ा के फौजदार नजाबत खान ने 1634 ई. में श्रीनगर गढ़वाल को जीतने के लिए अपनी सेवाएं पेश की। अप्रैल 1635 ई. मुगल सेना ने सिरमौर की पहाड़ियों में प्रवेश किया। शाहजहां ने सिरमौर के राजा मांधाता को भी फरमान भेजा कि वह शाही सेना की सहायता करें। अतः मन्धाता ने सिरमौर सेना लेकर नजाबत खां से भेंट की। इसके पश्चात नजाबत खां ने सिरमौर के राजा की सेना साथ लेकर श्रीनगर गढ़वाल पर चढ़ाई कर दी।

सोभाग प्रकाश (1654-64) :

सोभाग प्रकाश ने भी शाहजहाँ की गढ़वाल के साथ युद्ध मे सहायता की। सोभाग प्रकाश औरंगजेब का भी समकालीन था। राजा सुभग प्रकाश एक योग्य शासक था। उसने खेती-बाड़ी के विकास के लिए विशेष तौर पर प्रयत्न किए। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर औरंगजेब ने एक फरमान के द्वारा कालाखर इलाके को यह कर प्रदान किया कि उसके जमीदार राजा ने ठीक प्रकार से शासन नहीं चलाया। कालाखर संभवत देहरादून के पास का आज का कौलागढ़ क्षेत्र है जो सिरमौर के पास 1948 ईस्वी तक रहा।

बुद्ध प्रकाश/मही चन्द (1664-78) :

सोभाग प्रकाश के 2 पुत्र थे। बड़े का नाम मही चंद और छोटे का नाम हरि सिंह था। शुभग प्रकाश की मृत्यु के पश्चात मही चंद गद्दी पर बैठा। उसने अपने पिता की मृत्यु का समाचार औरंगजेब के पास दिल्ली भेजा। औरंगजेब ने फरमान द्वारा राजा मही चन्द को बुद्ध प्रकाश की उपाधि से सम्मानित किया और सिरमौर का राजा स्वीकार किया।

बुद्ध प्रकाश को क्योंथल की सेना ने ‘देशु की धार’ पर पराजित किया था। राजा बुद्ध प्रकाश की मुगल दरबार में अच्छी पहुंच थी। बह बेगम जहांआरा को कस्तूरी, अनार, बर्फ आदि के उपहार भेजा करता था और उसका बेगम के साथ बराबर पत्र व्यवहार होता रहता था। राजा बुध प्रकाश की सन 1678 में मृत्यु हो गई। उसके उपरांत उसका नाबालिग पुत्र योगराज मस्त या मेदनी प्रकाश के नाम से गद्दी पर बैठा।

मेदनी प्रकाश/जोग राज/मस्त (1678-1704) :

बुद्ध प्रकाश की जब मृत्यु हुई तो मेदनी प्रकाश नाबालिक था प्रशासन की बागडोर मंत्री दुल्लू मेहता के हाथ में आई मंत्र मंत्री प्रजा की ओर ध्यान नहीं देता था। सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह सिरमौर के राजा मेदनी प्रकाश के समकालीन थे । गुरु गोविंद सिंह इनके शासन काल मे नाहन और पौंटा आए। पौंटा में गुरु गोविंद सिंह 1684-1688 तक रहे और भगानी साहिब का युद्ध लड़ा।

हरि प्रकाश (1704-12) :

राजा मेदनी प्रकाश के कोई संतान नहीं थी। अतः उसकी मृत्यु के पश्चात उसका चाचा (बुध प्रकाश का पुत्र हरि सिंह) हरि प्रकाश के नाम से गद्दी पर बैठा। हरि प्रकाश के समय बाँदा9बहादुर सिरमौर आया था।

भूप प्रकाश (1712) :

मुगल शाह मुहम्मद मुआजिम बिन आलमवीर ने भूप प्रकाश को खिल्लत सहित भीम प्रकाश की उपाधि से सम्मानित किया था।

विजय प्रकाश :

इस राजा के समय से मुगल साम्राज्य का पतन होने लगा विजय प्रकाश का विवाह कुमायूं के राजा कल्याण चंद की पुत्री से हुआ। रानी धार्मिक प्रवृत्ति की थी वह अपने साथ काली की एक मूर्ति लाई थी जिसके लिए मंदिर का निर्माण करवाया गया उसका नाम कालिस्तान पड़ा।

प्रताप प्रकाश :

यह शासक बहुत कमजोर था । इस के समय में मुगलों का पतन हो रहा था।

कीरत प्रकाश :

प्रताप प्रकाश के पश्चात उसका बड़ा पुत्र किरत प्रकार 8 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा। वह एक कुशल शासक और योग्य सैनिक था। शीघ्र ही अपने राज्य में फैली अव्यवस्था ठीक करने तथा इसकी सीमाओं को सुदृढ़ करने में जुट गया। कीरत प्रकाश ने श्रीनगर (गढ़वाल) के राजा को हराकर नारायणगढ़, रामपुर, रामगढ़, मोरनी, पिंजौर और जगतगढ़ पर अधिकार कर लिया था। 1764 ई. में सिक्खों ने सरहिंद पर अधिकार कर लिया। थानेसर पर गंगा सिंह ने अपनी सत्ता जमा ली। वह यहां से सिरमौर के क्षेत्र पर छापे डालता था । इसके इन छापों से छुटकारा पाने के लिए सिरमौर का राजा उसे दो हजार रुपये वार्षिक कर देता रहा। 1809 ईसवी में अंग्रेजों के आने पर सिरमौर ने यह कर देना बंद कर दिया।

गुटखा कमांडर अमर सिंह थापा और कीरत प्रकाश के बीच एक संधि हुई जिसके अनुसार गंगा नदी को गोरखा व सिरमौर राज्य के बीच सीमा माना गया।

जगत प्रकाश :

कीरत प्रकाश के बाद उसका बड़ा पुत्र जगत प्रकाश गद्दी पर बैठा इसके कुछ समय के पश्चात सिरमौर में एक विद्रोह उठ खड़ा हुआ पटियाला के राजा अमर सिंह की सहायता से विद्रोह को दबा दिया गया। 14 वर्ष की आयु में उसका विवाह कांगड़ा के राजा संसार चंद की बहन से हुआ।

रोहिलखंड के मुसलमान शासक गुलाम कादिर रोहिल्ला और जगत प्रकाश के बीच में कटासन नामक स्थान पर युद्ध हुआ इसमें गुलाम कादर की हार हुई । राजा ने इस विजय की स्मृति में कटासन में दुर्गा का मंदिर बनाया। जॉर्ज फॉस्टर 1781 में नाहन आया था।

धर्म प्रकाश :(1792-1796) :

जगत प्रकाश के पश्चात उसका भाई धर्म प्रकाश गद्दी पर बैठा । हिंदूर का राजा राम शरण सिंह, कहलूर का राजा महान चंद और कांगड़ा का राजा संसार चंद उस के समकालीन थे। धर्म प्रकाश और हिन्दूर के राजा राम शरण सिंह के बीच झलरा-भलरा नामक स्थान पर युद्ध हुआ। संसार चंद की सेना के विरुद्ध लड़ते हुए धर्म प्रकाश की मृत्यु हो गई थी।

कर्म प्रकाश -ll (1796-1815) :

धर्म प्रकाश के कोई संतान नहीं थी इसलिए उसका छोटा भाई कर्म प्रकाश गद्दी पर बैठा। कर्म प्रकाश एक कमजोर शासक और अविश्वसनीय व्यक्ति था । उसके दुराचरण के कारण कई गंभीर विद्रोह हुए। जब वह गद्दी पर बैठा तो राज्य की असली अधिकार उसके भाई जगत प्रकाश और धर्म प्रकाश के समय से चले आ रहे वजीर के हाथ में थे।

हिंदुर का राजा राम शरण सिंह ने सिरमौर की भीतरी राजनीति में दखल देने लगा। उसने कुछ स्थानीय लोगों तथा राजा के परिवार के लोगों को भी राजा के विरुद्ध उकसाया। राजा के परिवार का एक कुंवर किशन सिंह विद्रोह करके सिरमौर में लूटमार करता रहा।

कर्म प्रकाश ने विद्रोह दवाने के लिए गोरखों से सहायता मांगी लेकिन हिंदूर के सैनिकों ने उन्हें घेर लिया और वापिस भागने के लिए बाध्य किया। यह घटना 1804 ई. की है। स्थिति को नाजुक देख कर राजा कर्म प्रकाश ने नाहन से भागकर क्यारदा दून में स्थित एक पहाड़ी पर कांगड़ा किला में जाकर शरण ली। सिरमौरी विद्रोही सैनिकों ने किले का घेराव किया जिसमें राजा का एक साथी मियाँ जवालु मारा गया। उसका रंग रूप राजा से मिलता था। सेनिको ने राजा की मृत्यु सोचकर किले से दूर हो गुए।

विद्रोहियों ने राजा के छोटे भाई रतन सिंह को रतन प्रकाश के नाम से राजा बना दिया। कर्म प्रकाश ने गोरखों की सहायता से अपना राज्य वापिस लिया। बाद में जब गोरखों ने संसार चन्द के विरुद्ध लड़ने के लिए कर्म प्रकाश से सहायता मांगी तो उसने इनकार कर दिया। तब अमर सिंह थापा ने अपने पुत्र को सिरमौर का प्रशासक बनाया । कर्म प्रकाश वहाँ से भाग गया। रंजौर सिंह ने ‘जातक दुर्ग’ का निर्माण करवाया।

राजा का किसी ने साथ नही दिया तो वह अपने वजीर मौजीराम मेहता के साथ लेकर बुरिया (अम्बाला) चला गया। वहाँ राजा अंग्रेज अधिकारी डेविड ऑक्टरलोनी से मिला।

अंग्रेज को रखा युद्ध के बाद 1815 ईस्वी में सिरमौर अंग्रेजों के अधीन आ गया। अंग्रेजों ने सिरमौर के राजा कर्म प्रकाश को उसकी अर्थ बुद्धि के कारण राज से वंचित कर दिया और उसके पुत्र फतेह प्रकाश को राजा बना दिया।

फतेह प्रकाश :

सितंबर 1815 को गवर्नर जनरल ने फतेह प्रकाश को गद्दी पर बैठाया। फतेह प्रकाश की बाल अवस्था में राज्य का कार्यभार माता गुलेरी रानी को दे दिया गया। कैप्टन जी वर्च को उनकी सहायता के लिए असिस्टेंट एजेंट नियुक्त किया गया। अजीत उल्ला खान को दिवान पड़ पर नियुक्त किया। 21 सितंबर, 1815 ई. को सनद द्वारा सिरमौर राज्य की मोरनी क्यारदा दून और जौनसार बावर क्षेत्र को अंग्रेज सरकार ने अपने पास रख लिया। राजा फतेह प्रकाश को 5 सितंबर,1833 ई. को एक सनद द्वारा 50 हजार रुपये के नजराने पर क्यारदा दून क्षेत्र वापिस लौटा दिया। 1827 ई. कि शिमला दरबार (लॉर्ड एमहर्स्ट के सम्मान में) में फ़तेह प्रकाश ने भाग लिया। फतेह प्रकाश ने नाहन में “शीशमहल” और “मोती महल” का निर्माण करवाया था । फतेह प्रकाश ने पंचकूला में नाहन कोठी बनवाई थी।

रघुवीर प्रकाश (1850-1856) :

अपने पिता की मृत्यु के पश्चात रघुवीर प्रकाश गद्दी पर बैठा। राजा रघुवीर प्रकाश के पांच रानियां थी। दूसरी रानी ‘हथियाली’ ने राज्य अधिकारी शमशेर सिंह को बर्ष 1845 में जन्म दिया। राजा के दो और पुत्रियां तथा एक पुत्र सूरत सिंह भी था ।

शमशेर प्रकाश (1856-1898) :

जब शमशेर प्रकाश गद्दी पर बैठा तो उसने उसकी आयु केवल 10 वर्ष की थी। इसलिए शिमला की पहाड़ी रियासतों के सुपरिंटेंडेंट विलियम है ने प्रशासन को चलाने के लिए 19 फरवरी 1857 को एक कमेटी बनाई जिसमें मेहता देवी दत्त और मोतीराम भंडारी मुख्य प्रशासक नियुक्त किए गए।

राजा नहीं 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों की सहायता की थी विद्रोह की समाप्ति पर सरकार ने कुंवर सुरजन सिंह को खिल्लत और आजा शमशेर प्रकाश को 7 तोपों की सलामी दी। जिसे 1867 में बढ़ाकर 11 कर दिया गया।

शमशेर प्रकाश की शादी क्योंथल के राजा की पुत्री से हुआ, जो राजा की अनुपस्थिति में राज्य के प्रशासन को संभालती थी। शमशेर प्रकाश ने 1867 ईस्वी में रानीताल बाग बनवाया।

राज्य 12 वजीरियों में बंटा हुआ था। राजा ने पुनः संगठित करके चार तहसीलों में विभक्त किया और इन तहसीलों में सरकारी कामकाज चलाने के लिए तहसीलदार नियुक्त किए। इन तहसीलों में थानेदार नियुक्त किए।

वर्ष 1888 ईस्वी में राजा ने “इंपीरियल सर्विस ट्रूप्स” नाम की एक सैनिक टुकड़ी तैयार की। शमशेर प्रकाश ने 1878 में पहली बार जमीन का बंदोबस्त कराया। यह बंदोबस्त लाहौर के मुंशी नंदलाल की देखरेख में हुआ। इस बंदोबस्त का विरोध संगड़ाह के नंबरदार उछबु और प्रीतम सिंह ने किया जिन्हें पकड़कर राजा के पास नाहन भेज दिया गया। दूसरी बार का बंदोबस्त 1887 ई. में परमेश्वरी सहाय की देखरेख में हुआ ।

राजा ने 1887 में नाहन में ‘नाहन फॉउंडरी’ नाम से लोहे का कारखाना खोला। नहान में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का मुख्यालय बनाया गया जिसकी स्थापना 1884 ई. में हुई थी। अंग्रेजी को 1890 ईस्वी में सरकारी कामकाज की भाषा बनाया। शमशेर प्रकाश ने 1893 में ‘नाहन नेशनल बैंक’ खोला। 1944 में इसका नाम “बैंक ऑफ सिरमौर” रखा गया।

भारत में लोक प्रशासन का आरंभ 1862 से हुआ। राजा शमशेर प्रकाश ने 1868 में सबसे पहले नहान म्युनिसिपल कमेटी बनाई।

1898 ई. लॉर्ड रिपन नाहन आए जबकि 1885 ईस्वी में लॉर्ड डफरिन नाहन आए। 1880 में शमशेर प्रकाश ने अपने रहने के लिए शमशेर विला बनवाया। 1878 ईस्वी में शमशेर प्रकाश ने लॉर्ड लिटन के नाहन प्रवास की स्मृति में लिटन मेमोरियल (दिल्ली गेट) बनवाया। 1891 ई. में राजा ने हाई कोर्ट की स्थापना की। शमशेर प्रकाश सबसे लंबी अवधि तक शासन करने वाले सिरमौर के राजा है। 1898 ई. को राजा शमशेर प्रकाश की मृत्यु हो गई।

इसे भी पढ़ें : हिमाचल प्रदेश की रियासतें एवम उनके संस्थापक

सुरेंद्र विक्रम प्रकाश (1898-1911) :

27 अक्टूबर, 1898 को राजा शमशेर सिंह की मृत्यु के उपरांत गद्दी पर बैठा। भारतीय सरकार ने 1902 में सुरेंद्र विक्रम प्रकाश को 5 वर्ष के लिए इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल का सदस्य बनाया। अंग्रेज सरकार ने उनके प्रशंसनीय कार्य तथा सहयोग के लिए उन्हें 9 नवंबर 1901 को KCSI की उपाधि से सम्मानित किया। 1906 ई. में अंग्रेज सरकार ने राजा को मृत्युदंड देने का अधिकार भी दे दिया। राजा सुरेंद्र विक्रम प्रकाश ने राज्य को प्रशासनिक आर्थिक और राजनीतिक रूप से संगठित किया जिसके परिणामस्वरूप सभी क्षेत्रों में विकास हुआ। राजा सुरेंद्र विक्रम प्रकाश की 4 जुलाई, 1911 को मसूरी में मृत्यु हो गई।

अमर प्रकाश (1911-1933) :

पहले विश्व युद्ध के समय राजा अमल प्रकाश ने सेना तथा धन देकर सरकार की बड़ी सहायता की थी इससे प्रसन्न होकर सरकार ने अमर प्रकाश को 3 जून 1915 को KCSI , 1918 में ‘महाराजा’ और 1921 में KCIE की उपाधि से सम्मानित किया। राजा ने अपनी पुत्री के नाम पर नाहन में ‘महिमा पुस्तकालय’ की स्थापना की जो हिमाचल प्रदेश का सबसे पुराना पुस्तकालय है। उन्होंने नाहन -काला अम्ब सड़क को 1927 ई. में पक्का करवाया। उनकी मृत्यु ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में 1933 ई. में हुई।

राजेन्द्र प्रकाश (1933-1948) :

राजेन्द्र प्रकाश सिरमौर रियासत के अंतिम शासक थे। राजा खेलों में बहुत रुचि रखते थे। वे हॉकी, पोलो, क्रिकेट, टेनिस को ज्यादा पसंद करते थे। राजा राजेन्द्र प्रकाश के समय 1937 ई. में सिरमौर प्रजामंडल की स्थापना हुई। 1942 में पझौता आंदोलन हुआ। पझौता आंदोलन में किसान सभा का गठन हुआ जिसका सभापति लक्ष्मी सिंह तथा सचिव वैद्य सूरत सिंह को चुना। 13 मार्च, 1948 ई. को महाराजा राजेन्द्र प्रकाश ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। 15 अप्रैल, 1948 को हिमाचल प्रदेश का जिला बना।

Brief History of District Sirmaur -Himachal | सिरमौर जिला का इतिहास

Leave a Reply