Dhami Praja Mandal | धामी प्रजा मण्डल

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धामी रियासत की “प्रेम प्रचारिणी सभा” ने सरकार के दमन से बचने के लिए रियासती प्रजा मण्डल शिमला में शामिल होने की योजना बनाई। इसी उद्देश्य को लेकर 13 जुलाई, 1939 ई. को भागमल सौहटा की अध्यक्षता में शिमला के निकट कुसुम्पटी के पास कैमली स्थान पर शिमला की पहाड़ी रियासतों के प्रजा मण्डलों की एक बैठक हुई।

इस बैठक में धामी रियासत की “प्रेम प्रचारिणी सभा” को “धामी प्रजा मण्डल’ में बदल दिया गया। धामी के पं. सीता राम को इस संगठन का प्रधान नियुक्त किया गया। इस अवसर पर धामी प्रजा मण्डल की ओर से एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें राणा धामी से निम्नलिखित माँगें की गई:

  • बेगार प्रथा को समाप्त किया जाए।
  • भूमि-लगान में पचास प्रतिशत कमी की जाए।
  • धामी राज्य प्रजा मण्डल को मान्यता प्रदान की जाए।
  • लोगों को नागरिक अधिकारों की स्वतन्त्रता प्रदान की जाए।
  • राज्य की जनता पर लगाए गए प्रतिबन्ध और अवरोधों को समाप्त किया जाए।
  • प्रेम प्रचारिणी सभा धामी के सदस्यों की जब्त की गई सम्पत्ति वापस की जाए।
  • धामी में एक प्रतिनिधि उत्तरदायी सरकार का गठन किया जाए और उसमें जनता के प्रतिनिधियों को प्रशासकीय कार्यों में नियुक्त किया जाए।

इस प्रस्ताव में व्यक्त किया गया कि यदि रियासत के शासक की ओर से उनके माँग पत्र पर शीघ्र कोई उत्तर नहीं मिला तो 16 जुलाई को सात व्यक्तियों का एक शिष्टमण्डल हलोग आकर राणा से मिलेगा।

मंशा राम को विशेष प्रतिनिधि बनाकर यह माँग पत्र राणा के पास धामी भेजा गया। राणा ने इस पत्र को अपना अपमान समझा। उसने प्रजा मण्डल की माँगें स्वीकार नहीं की और प्रस्ताव का उत्तर नहीं दिया। उत्तर न पाने पर यह तय किया गया कि पूर्व निर्धारित तिथि 16 जुलाई को भागमल सौहटा शिमला से धामी के लिए प्रस्थान करेंगे और धामी की राजधानी हलोग से लगभग डेढ़ मील दूर खेल के मैदान में उनके स्वागत में लोग इकट्ठे होंगे।

वहीं शेष छ: प्रतिनिधि हीरा सिंह पाल, मंशा राम चौहान, पं. सीता राम, बाबू नारायण दास. भगत राम और गौरी सिंह उनके साथ मिलेंगे। वहाँ से वे राणा दलीप सिंह के पास जाएँगे।

Dhami Praja Mandal | धामी प्रजा मण्डल

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