History of District Kangra in Hindi – Himachal Pradesh

History of District Kangra in Hindi – Himachal Pradesh

काँगड़ा का प्राचीन इतिहास

उत्तर पश्चिमी हिमालय में काश्मीर को छोड़कर त्रिगर्त (कांगड़ा) को आज के हिमाचल प्रदेश के इलाके वाले प्राचीनतम राज्यों में प्रथम स्थान प्राप्त था। यह राज्य इस प्रदेश के राज्यों में सबसे प्राचीन राज्य माना गया है। महाभारत के अनुसार इस राज्य की स्थापना अवश्य ही महाभारत काल से पहले हो चुकी थी।

इसके संस्थापक का नाम भूमि चन्द था। इस वंश के 234 वें राजा सुशर्म चन्द्र ने कौरवों की ओर से महाभारत युद्ध में भाग लिया था। इस राज्य का विस्तार पहाड़ों में सतलुज-व्यास और रावी नदियों के दूनों के मध्य भाग में और दक्षिण के मैदानी भाग में जालन्धर तक था। इसकी राजधानी ‘जालन्धर’ में थी।

इसलिये त्रिगर्त को जालन्धर या जालन्धरायण भी कहते थे। पर्वतीय भाग का मुख्य नगर नगरकोट त्रिगर्त राजाओं की ग्रीष्म कालीन राजधानी तथा पर्वतीय प्रान्तों के लिये प्रशासकीय सुविधा का केन्द्र रहा है।

  • हर्ष (607-647 ) के समय कश्मीर से लेकर नेपाल तक के सभी पहाड़ी राजा हर्ष का प्रभुत्व स्वीकार करते थे। जालंधर त्रिगर्त तथा कुल्लुत राज्य भी इसी श्रेणी में माने जाते थे और उन पर भी राजा हर्ष का प्रभुत्व था।
  • प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनत्सांग अपने वृतांत में लिखता है कि जालंधर राज्य 167 मील पूर्व से पश्चिम तक लम्बा और 133 मील उतर से दक्षिण की ओर चौड़ा है। ह्वेनत्सांग 635 ई. में काँगड़ा के राजा उदितों (उदिमा) के मेहमान बनकर काँगड़ा आए। वह पुन: 643 ई. काँगड़ा आए।
  • त्रिगर्त का वर्णन हमें राजतरंगिणी में मिलता है। राजतरंगिणी के अनुसार 470 ई. में श्रेष्ठ सेना, 520 ई में प्रवर सेना (दोनों कश्मीर के राजा ) ने त्रिगर्त पर आक्रमण कर उसे जीता था। काँगड़ा के राजा पृथ्वीचंद (883-903) ने कश्मीर के राजा शंकर वर्मन के विरुद्ध युद्ध किया था।
  • चम्बा में दो ताम्रपत्र मिले हैं इनके अनुसार साहिलवर्मन , त्रिगर्त और कुल्लुत के राजाओं ने मिलकर किरा (कश्मीर ) दुर्गर (जम्मू ) और समांतट : (बैलोर ) की आक्रमणकारी सेनाओं को परास्त किया।
  • राजतरंगिणी में ही त्रिगर्त के विषय में एक और उल्लेख मिलता है। उसमें लिखा है कि कश्मीर के राजा अनंत देव (1028-63 ) ने त्रिगर्त के कटोच वंश के राजा इंदूचंद की सूर्यमती से विवाह किया था।
  • “तारीख -ए-यामिनी ” के लेखक उतबी के अनुसार नगरकोट दुर्ग भीमनगर के नाम से प्रसिद्ध था।
  • 12 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 13 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के कुछ इतिहास का पता हमें काँगड़ा घाटी के बैजनाथ (प्राचीन वैद्य नाथ ) में स्थित शिव मंदिर के दो शिलालेखों से लगता है। यह शिलालेख शारदा लिपि में है। जिस समय का यह लेख है उस समय बैद्य नाथ नगर को कीरग्राम कहते थे।
  • त्रिगर्त का नाम महाभारत ,पुराणों और राजतरंगिणी में मिलता है। पाणिनि के अष्टाधयायी में त्रिगर्त को आयुध जीवी संघ कहा गया है।

यूरोपीय यात्री : थॉमस कोरयाट – 1615 ई. , थेवेनोट -1666 ई. , फॉस्टर -1783 ई. और विलियम मूरक्राफ्ट -1832 ई. में काँगड़ा की यात्रा की।

त्रिगर्त का अर्थ : त्रिगर्त का शाब्दिक अर्थ तीन नदियों रावी, व्यास और सतलुज के बीच फैले भू-भाग से हैं। बाणगंगा ,कुराली और न्युगल के संगम को भी त्रिगर्त कहा जाता है।

राजधानी : त्रिगर्त रियासत की राजधानी नगरकोट (वर्तमान काँगड़ा शहर ) थी जिसे भीमकोट , भीम नगर और सुशर्मापुर के नाम से भी जाना जाता था। इस शहर की स्थापना सुशर्मा ने की थी। महमूद गजनवी के दरवारी कवि उत्बी ने अपनी पुस्तक में इसे भीमनगर , फरिश्ता ने भीमकोट , अलबरूनी ने नगरकोट की संज्ञा दी थी।

काँगड़ा का मध्यकालीन इतिहास

सन 1001 ई. से महमूद गजनवी के आक्रमण पंजाब पर प्रति वर्ष बढ़ते ही गए। उसने 1009 ई. में पंजाब पर चौथी बार आक्रमण किया। महमूद गजनवी ने 1009 ई. में औहिंद के राजा आनंदपाल और उसके पुत्र ब्रह्मपाल को हराकर कांगड़ा पर आक्रमण किया। काँगड़ा का तत्कालीन शासक का नाम राजा जगदीश चंद्र था जो इस वंश के आदि-पुरुष भूमचंद्र की 436 वीं पीढ़ी में था।

काँगडा किले को 1043 ई. में तोमर शासक ने तुर्कों के कब्जे से आजाद करवाया। परन्तु वह 1051-52 ई. में पुन: तुर्कों के कब्जे में चला गया। 1060 ई. में काँगड़ा राजाओं ने पुनः काँगड़ा किले पर कब्जा कर लिया।

1170 ई. में त्रिगर्त दो भागों में बंट गया। उस समय त्रिगर्त का राजा पदमचंद्र था। उसके छोटे भाई पूर्व चंद्र ने अपने बड़े भाई से रुष्ट होकर होशियारपुर की जसवां नामक राज्य की स्थापना की। जसवां राज्य अपने इतिहास के प्रथम चरण में त्रिगर्त के ही अधीन रहा , परन्तु पंजाब पर मुसलमानों के आक्रमणों के बाद वह स्वतंत्र हो गया। जसंवा काँगड़ा से सबसे पहले निकलने (अलग होने) वाली शाखा (रियासत) थी। इसकी राजधानी ‘राजपुर’ थी। इसके शासक ‘जसवाल’ कहलाने लगे।

हृदयचंद्र :

त्रिगर्त के राजा हृदयचंद्र ने अपनी पुत्री लक्षणा का विवाह कीरग्राम (बैजनाथ) के राजा लक्ष्मणचंद्र के साथ किया था जो उसका अधिनस्थ जागीरदार था। बैजनाथ के शिलालेख जो ‘शारदा लिपि’ में है इसमें शक संवत् 1126 अंकित है जो ईसा का वर्ष 1204 है द्वारा इसका पता चलता है।

जय चंद्र :

वैजनाथ मंदिर के शिलालेख में काँगड़ा के राजा का नाम जय चंद्र (जय सिंह चंद्र ) है, जिसका शासन काल 1200 से 1220 ई. तक रहा है। उससे कोई पांच पीढ़ी बाद राजा पृथ्वी चंद्र त्रिगर्त का राजा हुआ।

पृथ्वीचंद (1330 ई.) :

पृथ्वी चंद 1330 ई. में गद्दी पर बैठा और 1345 ई. तक राज्य करता रहा। उसके शासनकाल में 1337 ई. में फिर नगरकोट पर दिल्ली शासक मुहम्मद तुगलक ने आक्रमण किया। पृथ्वी चंद के बाद पूर्व चंद्र (1345 -1360 ) और रूप चंद्र (1360 -75) त्रिगर्त के राजा हुए।

रूपचंद (1360 ई.) :

रूप चंद के समय फिरोजशाह तुगलक के 1365 ई. के आक्रमण के समय काँगड़ा का राजा था। रूपचंद का नाम ‘मानिकचंद’ के नाटक ‘धर्मचन्द्र नाटक’ में भी मिला है जो 1562 ई. के आसपास लिखा गया था। 1361ई.फिरोजशाह तुगलक ने नगरकोट पर आक्रमण किया। राजा ने किले का दरवाजा बंद कर लिया और एक सुरक्षित स्थान से लड़ता रहा। इसी बीच सुल्तान ने ज्वालामुखी के मंदिर को नष्ट कर दिया। फिरोजशाह तुगलक ज्वालामुखी मंदिर से 1300 पुस्तकें फारसी में अनुवाद के लिए ले गया। इन पुस्तकों का फारसी में ‘दलील-ए-फिरोजशाही’ के नाम से अनुवाद ‘इज्जुद्दीन खालिदखानी’ ने किया।

सांगरचंद :

रूपचंद के बाद उसका पुत्र सांगरचंद 1375 ई. में गद्दी पर बैठा। फिरोजशाह तुगलक के पुत्र नसीरूद्दीन ने 1389 ई. में भागकर नगरकोट पहाड़ियों में शरण ली थी तब काँगड़ा का राजा सागरचंद था। 1390 को उसे दिल्ली बुलाया गया।

मेघचन्द :

1390 ई. में सांगरचंद के पश्चात मेघचन्द गद्दी पर बैठा और और 1405 तक राज किया। मेघचंद के समय 1398 ई. में तैमूर लंग ने शिवालिक की पहाड़ियों को लूटा था। वर्ष 1399 ई. में वापसी में तैमूरलंग के हाथों धमेरी (नूरपुर) को लूटा गया। हण्डूर (नालागढ़) के राजा आलमचंद ने तैमूरलंग की मदद की थी।

हरिचंद-I ( 1405 ई.) और कर्मचंद :

हरिचंद-I एक बार शिकार के लिए हडसर (गुलेर) गए जहाँ वे कुएँ में गिरकर अपने सैनिकों से बिछुड़ गए और कई दिनों तक नहीं मिले। उन्हें मरा समझकर उनके भाई कर्मचंद को राजा बना दिया गया। हरिचंद को 21 दिन बाद एक व्यापारी राहगीर ने खोजा। हरिचंद को अपने भाई के राजा बनने का समाचार मिला तो उन्होंने हरिपुर में किला व राजधानी बनाकर गुलेर राज्य की 1405 ई. में स्थापना की। आज भी गुलेर को काँगड़ा के हर त्योहार/उत्सव में प्राथमिकता मिलती है क्योंकि वह काँगडा वंश के बड़े भाई द्वारा स्थापित किया गया था। संसार चंद-1 कर्मचंद का बेटा था जो 1430 ई. में राजा बना। इसके बाद दिवंगा चंद्र , नरेंद्र चंद्र , सुवीर चंद्र, प्रयाग चंद्र, राम चंद्र ,धर्मचंद्र गद्दी पर बैठे।

धर्मचन्द (1528-63 ई.) :

धर्मचंद शेरशाह सूरी और हुमायूं का समकालीन काँगड़ा का राजा था। धर्मचंद के शासनकाल में 1562 ई. में माणिक चंद नामक एक भट ने धर्मचंद नामक नाटक लिखा था जिसमें काँगड़ा के राजा रूपचंद और दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह का वर्णन मिलता है। इसके राज्य काल में शेरशाह सूरी ने 1540 ई. में दिल्ली पर अधिकार किया। इसके बाद उसने अपने सेना अध्यक्ष ‘ख्वास खान ‘ को नगरकोट पर आक्रमण करने के लिए भेजा।

धर्मचंद (1528 ई. से 1563 ई.), मानिक चंद (1563 ई. से 1570 ई.), जयचंद (1570 ई. से 1585 ई.) और विधिचंद (1585 ई. से 1605 ई.) अकबर के समकालीन राजा थे।

जय चंद :

राजा जयचंद (1570 ई. से 1585 ई.) को अकबर ने गुलेर के राजा रामचंद की सहायता से बंदी बनाया था। राजा जयचंद के बेटे विधिचंद ने 1572 ई. में अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया। अकबर ने हुसैन कुली खान को काँगड़ा पर कब्जा कर राजा बीरबल को देने के लिए भेजा। ‘तबाकत-ए-अकबरी’ के अनुसार खानजहाँ ने 1572 ई. में काँगड़ा किले पर कब्जा कर लिया परन्तु हुसैन मिर्जा और मसूद मिर्जा के पंजाब आक्रमण की वजह से उसे इसे छोड़ना पड़ा। अकबर ने टोडरमल को पहाड़ी क्षेत्रों को मापने के लिए भेजा। टोडरमल ने साठ गाँव काँगड़ा से लिए और ‘रिहलु’ का इलाका चम्बा से लिया।

बिधि चंद :

राजा जय चंद की मृत्यु 1585 ई. में हुई और उसके पश्चात विधिचंद काँगड़ा की गद्दी पर बैठा।1589 ई. में विधिचंद ने पहाड़ी राजाओं से मिलकर मुग़ल शासक के खिलाफ विद्रोह किया। जैन खान कोका ने विद्रोह को दबा दिया। बिधि चंद को अपने पुत्र त्रिलोकचंद को बंधक के तौर पर मुगल दरबार में रखना पड़ा। 1594-95 ई. में पहाड़ी राजाओं ने दोबारा विद्रोह किया। इस बार विद्रोह का नेतृत्व जसरोटा के राजा ने किया। इसमें बिधि चंद और नूरपुर के राजा बासु ने भाग नहीं लिया।

त्रिलोक चंद : राजा विधिचंद के बाद उसका सुपुत्र त्रिलोक चंद 1605 ई. में गद्दी पर बैठा। उसी वर्ष जहाँगीर (1605) भी गद्दी पर बैठा था।

हरिचंद :

1612 ई. में हरिचंद द्वितीय राजा बना। उस समय उसकी आयु 4 वर्ष थी। 1615 ई. में जब हरिचंद की आयु सात वर्ष की थी तो उस समय जहांगीर ने पंजाब के निजाम मुर्तजा खां और नूरपुर के राजा सूरजमल को काँगड़ा पर अधिकार करने भेजा। लेकिन उन दोनों के बीच झगड़ा होने से घेराव असफल रहा।

सितम्बर 1617 ई. में जहांगीर ने फिर से सूरजमल को काँगड़ा भेजा साथ में मुहम्मद तकी को भेजा उनके बीच भी झगड़ा हो गया। इसके बाद जहांगीर ने राजा विक्रमजीत (सुन्दरदास ) को सूरजमल के विद्रोह को दबाने भेजा। इसमें सूरजमल की हार हो गई। वह चम्बा भाग गया। वहां 1619 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

सूरजमल के छोटे भाई जगत सिंह और विक्रमजीत की मदद से 1620 ई. में कांगड़ा किले पर नबाव अली खान ने कब्ज़ा कर लिया। नवाब अली खान काँगड़ा किले का पहला मुग़ल किलेदार था। जहांगीर ने किले में एक द्वार भी बनवाया था और उस पर किला-विजय की तिथि भी अंकित करवाई थी। इसी द्वार का नाम जहांगीरी दरवाजा रखा गया।

जहांगीर स्वयं अपनी पत्नी नूरजहां के साथ सिब्बा गुलेर होते हुए काँगड़ा पहुँचा। उसने काँगड़ा किले में मस्जिद बनाई। वापसी में वह धमेरी (नूरपुर) और पठानकोट होता हुआ वापिस गया। धमेरी का नाम उसने अपनी पत्नी के नाम पर नूरपुर रखा।

चंद्रभान चंद :

चंद्रभान काँगड़ा वंश का अगला राजा हुआ जिसे मुगलों ने राजगीर की जागीर देकर अलग जगह बसा दिया। उसने धर्मशाला के पास एक किले का निर्माण करवाया। चंद्रभान को 1660 ई. में औरंगजेब ने गिरफ्तार किया।

विजयराम चंद :

चंद्रभान चंद के बाद उसका पुत्र विजय राम चंद 1660 में उसका उत्तराधिकारी बना। उसने व्यास नदी के दाएं किनारे पर विजयपुर (बीजापुर ) नामक नगर बसाया जो पीढ़ियों तक इसके राजाओं की राजधानी रही।

उदय रामचंद : 1687 में विजयराम चंद की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई उदयराम चंद राजा बना। उसने 3 साल शासन किया। 1690 में उसकी मृत्यु हो है।

भीम चंद :

1690 ई में उदय रामचंद का पुत्र भीम चंद राजा बना। उसके समय जम्मू के राजा ने उसके इलाके पर आक्रमण किया। उसने गुरु गोविन्द सिंह से मिलकर आक्रमणकारियों को मार भगाया। इस राजा के औरंगजेब से अच्छे सबंध रहे और वह कई बार मुग़ल दरबार में भी जाता रहा। जिससे प्रसन्न होकर बादशाह ने उसे ‘दिवान’ की पदवी दी। उसने बीजापुर मंदिर भी बनवाया। उसके भाई कृपाल चंद ने भरवाना नामक एक बहुत लम्बी कुहल
बनवाई जिससे वह लोगों में बहुत लोकप्रिय हुआ। 1697 ई. में भीमचंद की मृत्यु हो गई।

आलमचंद : राजा आलमचंद ने 1697 ई. में सुजानपुर के पास आलमपुर शहर की नींव रखी।

हमीर चंद : आलमचंद के पुत्र हमीरचंद ने हमीरपुर में किला बनाकर हमीरपुर शहर की नींव रखी। इसी के कार्यकाल में नवाब सैफअली खान (1740 ) काँगड़ा किले का अंतिम मुग़ल किलेदार बना।

अभय चंद : अभय चंद 1747 ई. में राजा बना। अभयचन्द ने ठाकुर द्वारा और 1748 ई. में टिहरा में किले की स्थापना की।

गंभीर चंद : अभय चंद का कोई पुत्र नहीं था तो 1750 में उसके चाचा गंभीर चंद राजा बने। वह केवल एक साल तक ही राज कर सका।

घमंड चंद (1751 ई. से 1774 ई.) :

घमण्ड चंद ने 1761 ई. में सुजानपुर शहर की नींव रखी। अहमदशाह दुर्रानी के आक्रमण (मुगलों पर) का फायदा उठाकर घमण्ड चंद ने काँगड़ा किला को छोड़कर अपनी पुरानी सारी रियासत पर कब्जा कर लिया। घमण्ड चंद को 1759 ई. में अहमदशाह दुर्रानी ने जालंधर दोआब का निजाम बनाया। घमण्ड चंद की 1774 ई. में मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र तेगचंद 1774 में गद्दी पर बैठा। 1775 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

संसार चंद-II ( 1775 ई. से 1824 ई.) :

राजा संसार चंद 10 वर्ष की आयु में राजा बना। जस्सा सिंह रामगढ़िया पहला सिख था जिसने काँगड़ा, चम्बा, नूरपुर की पहाड़ियों पर आक्रमण किया। उसे 1775 ई. में जय सिंह कन्हैया ने हराया। संसार चंद ने जय सिंह कन्हैया को काँगड़ा किले पर कब्जे के लिए 1781 ई. में बुलाया। सैफअली खान की मृत्यु के बाद 1783 ई. में जय सिंह कन्हैया ने काँगड़ा किले पर कब्जा कर लिया। उसने 1787 ई. में संसार चंद को काँगड़ा किला सौंप दिया तथा बदले में मैदानी भू-भाग ले लिया।

संसार चंद के आक्रमण- संसार चंद ने रिहलू के लिए चम्बा के राजा जय सिंह को 1786 ई. में नेरटी शाहपुर में हराया। उसने मण्डी के राजा ईश्वरीसेन को
बंदी बना 12 वर्षों तक नदौन में रखा जिसे बाद में अमर सिंह थापा ने छुड़वाया। संसार चंद ने 1794 ई. में बिलासपुर पर आक्रमण किया जो बाद में उसके पतन का कारण बना। कहलूर (बिलासपुर) के राजा महान चंद ने गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा को संसार चंद पर आक्रमण के लिए निमंत्रण दिया।

संसार चंद के समय जॉर्ज फॉस्टर (1783 ई. में), विलियम मूरक्रॉफ्ट (1820 ई. में) और जॉर्ज ट्रीबैक (1820 ई. में) काँगड़ा में आये। संसार चंद को चम्बा की नोखू गद्दण से प्यार हो गया था।

संसार चंद का पतन :

अमर सिंह थापा ने 1805 ई. में बिलासपुर, सुकेत, सिरमौर चम्बा की संयुक्त सेनाओं के साथ मिलकर महलमोरियों (हमीरपुर) में संसार चंद को हराया। संसार चंद ने काँगड़ा किले में शरण ली। संसार चंद ने नौरंग वजीर की मदद से काँगड़ा किले से निकलकर 1809 में महाराजा रणजीत सिंह के साथ ज्वालामुखी की संधि की। 1809 ई. में महाराजा रणजीत सिंह ने अमर सिंह को हराया।

संसार चंद ने काँगड़ा किला और 66 गाँव महाराजा रणजीत सिंह को दिए। महाराजा रणजीत सिंह ने देसा सिंह मजीठिया को काँगड़ा किले व क्षेत्र का नाजिम (गर्वनर) बनाया। संसार चंद की 1824 ई. में मृत्यु हो गई। महाराजा रणजीत सिंह ने संसार चंद के पुत्र अनिरुद्ध चंद को फतेह सिंह अहलुवालिया के साथ बंधक रखा हुआ था (1809 ई. में)। संसार चंद की मृत्यु के बाद अनिरुद्ध चंद एक लाख रुपया रणजीत सिंह को नजराना देकर गद्दी पर बैठा।

अनिरुद्ध चंद (1824) :

महाराजा संसारचंद के बाद उसका पुत्र अनिरुद्ध गद्दी पर बैठा। कुछ वर्षों तक महाराजा रणजीत सिंह के साथ उसके संबंध बहुत अच्छे रहे। महाराजा रणजीत सिंह ने अनिरुद्ध चंद से अपने प्रधानमंत्री राजा ध्यानसिंह (जम्मू) के पुत्र हीरा सिंह के लिए उसकी एक बहन का हाथ माँगा। अनिरुद्ध चंद ने टालमटोल कर अपनी बहनों का विवाह टिहरी गढ़वाल के राजा से कर दिया।

अनिरुद्ध चंद स्वयं अंग्रेजों के पास अदिनानगर पहुँच गया। अनिरुद्ध चंद के चाचा फतेहचंद ने अपनी पौत्री का विवाह रणजीत सिंह के पुत्र हीरा सिंह से किया जिससे प्रसन्न होकर रणजीत सिंह ने उसे ‘राजगिर’ की जागीर भेंट की। संसार चंद की रखैल के पुत्र जोधवीरचंद ने अपनी दो बहनों का विवाह रणजीत सिंह के साथ किया।

1833 ई. में रणजीत सिंह ने अनिरुद्ध चंद की मृत्यु के बाद उसके बेटों (रणबीर चंद और प्रमोदचंद) को महलमेरियो में जागीर दी। वर्ष 1846 ई. में काँगड़ा पूर्ण रूप से ब्रिटिश प्रभुत्व में आ गया। अनिरुद्ध चंद के बाद रणबीर चंद (1828 ई.), प्रमोद चंद (1847 ई.), प्रतापचंद (1857 ई.), जयचंद (1864 ई.) और ध्रुवदेव चंद काँगड़ा के राजा बने।

राजा जयचंद को ब्रिटिश आर्मी में 1888 ई. में मेजर की उपाधि दी गई थी। ध्रुवदेव चंद काँगड़ा रियासत का अंतिम राजा था। 1850-51 ई. में राजा प्रमोदचंद की मृत्यु के बाद लम्बाग्राम के रईस प्रतापचंद को कटोच वंश का मुखिया बनाया गया। राजा जय चंद को ‘महाराजा ‘ की उपाधि भी दी गई। अंग्रेजों ने 1855 ई. में काँगड़ा का मुख्यालय धर्मशाला स्थानांतरित किया। ध्रुव देव की मृत्यु 1988 में हुई।

मूल काँगड़ा राज्य से निकली शाखाएँ :

काँगड़ा रियासत का इतिहास अपूर्ण रहेगा यदि हम इस राज्य से निकली शाखाओं का वर्णन नहीं करते हैं। ये शाखाएं थी – जसवां ,गुलेर ,सिब्बा , दातारपुर ,नूरपुर ,कुटलैहड़ तथा बड़ा बंगाहल। ये सभी रियासतें वर्तमान में काँगड़ा जिले का हिस्सा है।

जसवां रियासत

1170 ई. में काँगड़ा के राजा पदम चंद के छोटे भाई पूर्व चंद ने अपने भाई से जुड़ा होकर होशियारपुर की जसवां दून में अपने लिए एक पृथक राज्य की स्थापना की। होशियारपुर का जिला प्राचीनकाल में त्रिगर्त राज्य का एक भाग था। बाद में यह भाग जसवां तथा दातारपुर जैसी छोटी रियासतों में बँट गया। काँगड़ा से अलग होने वाली ‘जसवां पहली रियासत थी। वर्तमान में यह ऊना जिला का भाग है।

जसवां राज्य के प्रारम्भिक इतिहास पर कोई संतोष जनक जानकारी नहीं मिली है।

गोबिंद चंद :

सन 1572 ई. में जब काँगड़ा के राजा जयचंद को बंदी बनाकर दिल्ली ले जाया गया तो उसने अपने पुत्र बिधि चंद को जसवां के राजा गोबिंद चंद के संरक्षण में छोड़ा था। गोबिंद चंद ने काँगड़ा किले की पूर्ण सुरक्षा की लेकिन मुग़ल कमाण्डर द्वारा दिए गए प्रलोभन के उपरांत उसने किला मुगलों के अधीन छोड़ दिया।

उमेद चंद :

संसार चंद जसवां और दातारपुर पर अपना प्रभुत्व ज़माने लगा था। जसवां के राजा ने गोरखा आक्रांताओं व अन्य पहाड़ी राजाओं के साथ मिलकर संसार चंद को काँगड़ा के किले में शरण लेने के लिए बाध्य किया। इस समय जसवां का राजा उमेद सिंह था। उमेद चंद और उसके पुत्र जय सिंह की अल्मोड़ा में मृत्यु हो गई।

रणसिंह : सन 1877 ई. में जम्मू के महाराजा रणवीर सिंह की प्रार्थना पर, अंग्रेजी सरकार ने ‘जसवां’ की जागीर राजा रणसिंह को सौंप दी जो असल रूप में उम्मेद सिंह के पास थी।

राजा रघुनाथ सिंह :

इनका जन्म 1852 में हुआ। यह जसवां राज्य के 30 वें राजा थे। इनका शासन 1892 से 1918 तक था। इनको राजा की उपाधि इनकी पारिवारिक पृष्टभूमि तथा महाराजा जम्मू कश्मीर के साथ वैवाहिक सबंधों के कारण मिली थी। लेकिन राजा के पास कोई प्रशासनिक अधिकार नहीं थे।

राजा लक्ष्मण सिंह : जसवां रियासत का 31वां राजा राजा लक्ष्मण सिंह था यह जसवां राजसी परिवार का मुखिया , जिसका निवास स्थान रामकोट था।

राजा चैन सिंह (1945 -1948 ) : जसवां रियासत का 32वां राजा।

गुलेर रियासत

मूल काँगड़ा राज्य से निकली राज्य शाखाओं में गुलेर ‘दूसरा स्थान’ आता है।1405 ई. में काँगड़ा के राजा हरिचंद आखेट करने गया। जंगल में सूअर का पीछा करते हुए राजा साथियों से अलग हो गया और एक कुएं में गिर गया। कुछ दिनों बाद उसे एक व्यापारी ने उसे कुएँ से बाहर निकाला। मरा हुआ समझ कर हरिचंद की रानियां सती हो गई और उसके छोटे भाई धर्मचंद ने काँगड़ा के सिहांसन को संभाला।

कई दिनों बाद जब राजा हरिचंद घर लौटा तो उसके भाई ने राज गद्दी छोड़नी चाही लेकिन हरिचंद ने मना कर दिया। उसने 1405 ई. में गुलेर रियासत की स्थापना हरिपुर में की जहाँ उसने शहर व किला बनवाया। हरिपुर किले को गुलेर किला भी कहा जाता है। हरिपुर गुलेर रियासत की राजधानी थी। गुलेर रियासत का पुराना नाम ग्वालियर था। गुलेर रियासत से 1450 ई. में सिब्बा रियासत (सिवराम चंद द्वारा) का जन्म हुआ था।

रामचंद (1540 ई. से 1570 ई.) :

1540 ई. में रामचंद गद्दी पर बैठा। गुलेर रियासत के 15वें राजा ने काँगड़ा के राजा जयचंद को पकड़ने में मुगलों की मदद की। वह अकबर का समकालीन राजा था।

जगदीश चंद (1570 ई. से 1605 ई.) :

रामचंद के बाद उसका पुत्र जगदीश चंद 1570 ई. में गद्दी पर बैठा। 1572 में काँगड़ा के राजा के विद्रोह को दबाने के लिए जो सेना भेजी उसमें जगदीश चंद ने भाग नहीं लिया। जब 1572 ई. में मुग़ल सेना हुसैन कुली खान के नेतृत्व में नूरपुर से कोटला की ओर बढ़ी तो उसने कोटला किले पर अधिकार करके गुलेर राजा जगदीश चंद को वापिस कर दिया। पहाड़ी राजाओं ने पुन: 1588 ई. और 1594-95 ई. में दो बार मुग़ल साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह किये। लेकिन विद्रोहियों के नामों में गुलेर का नाम नहीं मिलता है।

विजय चंद (1605 ई.) :

जगदीश चंद के पश्चात् उसका पुत्र विजयचन्द 1605 ई. में गुलेर का राजा बना। वह केवल पांच वर्ष तक ही शासन कर सका।

रूपचंद (1610 ई. से 1635 ई.) :

रूपचंद ने काँगड़ा किले पर कब्जे के लिए मुगलों की मदद की थी। जहाँगीर ने उसे अच्छी ‘खिलत’ और ‘बहादुर’ की उपाधि प्रदान की। वह जहाँगीर का समकालीन था। 1623-24 ई. में भी रूप चंद ने नूरपुर के राजा जगत सिंह के विद्रोह को दबाने में मुग़ल सेना की सहायता की।

मानसिंह (1635 ई.-1661 ई.) :

मानसिंह को उसकी बहादुरी के लिए शाहजहाँ ने ‘शेर अफगान’ की उपाधि दी थी। उसने मकोट व तारागढ़ किले पर 1641-42 ई. में कब्जा किया था। मानगढ़ का किला मानसिंह ने बनवाया था। 1661 ई. में बनारस में उसकी मृत्यु हो गई।

विक्रम सिंह (1661 ई.) :

विक्रम वहुत ह्रष्ट-पुष्ट था। कहते हैं की वह नारियल को अपनी उँगलियों में दबाकर तोड़ देता था। औरंगजेब ने उसे काँगड़ा पर्वतीय भाग का सूबेदार बनाया।

राज सिंह (1675 ई.-1695 ई.) :

राज सिंह ने चम्बा के राजा चतर सिंह, बसौली के राजा धीरजपाल और जम्मू के किरपाल देव के साथ मिलकर मुगलों को हराया था। राजसिंह ने काँगड़ा के किलेदार हुसैन खान, अलफ खान और मियां खां के विरुद्ध मोर्चा खोला तथा मंडी और कहलूर के मुग़ल हस्तक्षेप से बचने में सहायता की थी।

दलीप सिंह (1695 ई.) :

1695 ई. में राज सिंह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र दलीप सिंह राजा बना। उस समय उसकी आयु केवल सात वर्ष की थी। अत: चम्बा के राजा उदय सिंह ने उसके संरक्षक का भार अपने ऊपर लिया।

गोवेर्धन सिंह (1730 ई.) :

गोवेर्धन सिंह 1730 ई. में राजा बना। उसके गद्दी पर बैठते ही उसका जालंधर के सूबेदार अदीना बेग से झगड़ा हो गया। गोवेर्धन सिंह के पास एक घोड़ा था जो अदीना बेग को बहुत पसंद आया। इसके पीछे दोनों के बीच युद्ध हुआ जिसमे अदीना बेग हार गई।

प्रकाश सिंह (1760 -1790 ई.) :

प्रकाश सिंह से पूर्व दलीप सिंह (1695 -1730) और गोवर्धन सिंह (1730 -1760) गुलेर के राजा बने। प्रकाश सिंह के समय घमण्ड चंद ने गुलेर पर कब्जा किया। बाद में संसार चंद ने गुलेर पर कब्जा किया। ध्यान सिंह वजीर ने कोटला इलाका गुलेर राज्य के कब्जे (1785) में रखने में मदद की।

भूप सिंह (1790 -1820 ई.)

भूप सिंह गुलेर का आखिरी राजा था जिसने शासन किया। देसा सिंह मजीठिया ने 1811 ई. में गुलेर पर कब्जा कर कोटला किले पर कब्जा कर लिया। भूप सिंह के पुत्र शमशेर सिंह (1820-1877 ई.) ने सिक्खों से हरिपुर किला आजाद करवा लिया था। शमशेर सिंह के बाद जय सिंह, रघुनाथ सिंह और बलदेव सिंह (1920 ई.) गुलेर वंश के राजा बने। वर्ष 1846 ई. में गुलेर पर अंग्रेजों का शासन स्थापित हो गया।

सिब्बा रियासत

सिब्बा राज्य की नींव गुलेर के संस्थापक राजा हरिचंद से चार पीढ़ी बाद के राजा के छोटे भाई स्वर्ण चंद ने 1450 ई. में की थी। 1622 ई. में जहांगीर और नूरजहाँ सिब्बा आये थे। 1786 ई. से लिकर 1806 ई तक काँगड़ा के राजा संसार चंद ने भी इसे अपने अधीन रखा।

गोरखों ने जब 1806 ई. में काँगड़ा पर आक्रमण किया तो वहाँ एक प्रकार से अराजकता फैली हुई थी और इसी का लाभ उठाकर गुलेर राजा भूप सिंह ने सिब्बा पर 1808 ई. में चढ़ाई करके इसे अपने राज्य में मिला दिया। परन्तु 1809 ई. में जब रणजीत सिंह ने कांगड़ा से गोरखों को भगा दिया तो अन्य पहाड़ी राज्यों के साथ -साथ सिब्बा पर भी उसका अधिकार हो गया।

1830 ई. में रणजीत सिंह ने इसे पूर्ण रूप से राजा गोविन्द सिंह को लौटा दिया। गोविन्द सिंह की मृत्यु 1845 ई. में हो गई। सिब्बा का अंतिम राजा राम सिंह सन 1845 ई. में सिहांसन पर बैठा। उसने सन 1848 ई. के दूसरे सिक्ख युद्ध में सिक्खों को सिब्बा किले से भगा दिया तथा अपने चचेरे भाई विनय सिंह की जागीर भी छीन ली। इसके साथ ही सिब्बा अंग्रेजी शासन के अधीन आ गया।

1874 ई में राजा राम सिंह की निःसंतान मृत्यु हो गई। तथा जागीर पुन: विनय सिंह के पास आ गई। विनय सिंह के बाद उसके पुत्र जय सिंह ने गद्दी संभाली। जिसकी 1920 में मृत्यु हुई। उसके बाद उसका पुत्र गजेंद्र सिंह को उत्तराधिकारी नियुक्त किया। परिवार का अंतिम पारम्परिक शासक शाम सिंह था जो राजा की अपेक्षा एक परिवार प्रमुख की पदवी रखता था।

दतारपुर रियासत

दातारपुर एक छोटा राज्य था। यह सिब्बा राज्य की शाखा थी जिसकी स्थापना 1550 ई. में दातार चंद ने की थी। इन्होने अपने पारिवारिक नाम ‘डडवाल’ रखा।

गोबिंद चंद : 1806 ई. में गोबिंद चंद ने भी काँगड़ा के राजा संसार चंद के विरुद्ध गोरखों को बुलाने में साथ दिया था। 1809 ई. में जब रणजीत सिंह ने गोरखों को काँगड़ा से भगा दिया तो यह राज्य भी उसके अधिपत्य में आ गया।

जगत चंद : 1818 ई. में गोविन्द चंद की मृत्यु हो गई और जगत चंद राजा बना। 1848 ई. में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया तो उन्हें कैद कर अल्मोड़ा भेज दिया गयाजहाँ उनकी 1877 ई. में मृत्यु हो गई।

नूरपुर रियासत

नूरपुर का प्राचीन नाम धमेरी था। नूरपुर राज्य की पुरानी राजधानी पठनकोट (पैठान) थी। अकबर के समय में नूरपूर के राजा बासदेव ने राजधानी पठानकोट से नूरपुर बदली। प्राचीन काल में नूरपुर और पठानकोट औदुम्बर क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। नूरपुर रियासत के राजाओं के वशंज का नाम पठानिया था जो कि ‘पैथान’ शब्द से उत्पन्न हुआ है।
स्थापना : नूरपुर राज्य की स्थापना चंद्रवंशी दिल्ली के तोमर राजपूत झेठपाल (जीतपाल) द्वारा 1000 ई. में की गई थी।

जसपाल (1313-1337 ई.) : अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद बिन तुगलक का समकालीन था।

कैलाशपाल (1353-1397 ई.) :

कैलाशपाल ने ‘तातार खान’ (खुरासान का गर्वनर फिरोजशाह तुगलक के समय) को हराया था। कैलाश पाल ने जन कल्याण के उद्देश्य से एक रांकी नामक कुहल रावी नदी से खुदवा कर पठानकोट तक लाई थी।

नागपाल : कैलाश पाल के पश्चात् नागपाल राजा हुआ।

पृथ्वी पाल (फातोपाल) : पृथ्वीपाल 1438 से 1473 ई. तक राजा रहा।

भीलपाल :

1473 ई. में भील पाल राजा बना। वह दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी का समकालीन था। भील पाल ने सुल्तान सिकंदर लोदी की कई लड़ाइयों में सहायता की जिससे प्रसन्न होकर सुल्तान ने खिल्लत के तौर पर कुछ इलाका उसे दे दिया।

भक्तमल (1513-1558 ई.):

भक्तमल का विवरण ‘अकबरनामा’ में मिलता है। भक्तमल के समय शेरशाह सुरी के पुत्र सलीमसूर शाह ने मकोट किला बनवाया। सिकंदर शाह ने अकबर के शासनकाल में 1557 ई. में भक्तमल के सहयोग से मकौट किले में शरण ली। मुगलों ने 1558 ई. को भक्तमल को गिरफ्तार कर लाहौर भेज दिया जहाँ बैरम खाँ ने उसे मरवा दिया। भक्तमल ने शाहपुर में भी किला बनवाया था।

तख्तमल (1558 -1580 ई.) :

को भक्तमल के स्थान पर राजा बनाया गया। वह भक्तमल का भाई था। उसने सर्वप्रथम अपनी राजधानी को पठानकोट से धमेरी बदलने के बारे में सोचा परन्तु हकीकत में लाने से पहले ही मर गया।

बासदेव (1580-1613 ई.) :

बासदेव ने नूरपुर की राजधानी पठानकोट से धमेरी बदली। बासदेव ने कई बार मुगलों के विरुद्ध (खासतौर पर अकबर) विद्रोह किया। ये सारे विद्रोह सलीम (जहाँगीर) के समर्थन में थे। बासदेव के जहाँगीर के साथ बहुत अच्छे संबंध थे। अकबरनामा में बासदेव को राजा बासू कहा गया है। उसने 1585,1589-90 तथा 1594-95, 1602-03,1603-04 में अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया।

जहाँगीर से अच्छे संबंध होने की वजह से अकबर ने राजा बासू को माफ कर दिया। राजा बासू इन विद्रोहों के दौरान माओकोट किले (चक्की नदी के पूर्व में स्थित) में शरण ली थी। जहाँगीर ने सम्राट बनने के बाद राजा बासू का मनसब 1500 से बढ़ाकर 3500 कर दिया।

सूरजमल (1613 -19 ई. ) :

सूरजमल को बासदेव की मृत्यु के बाद नूरपुर का राजा बनाया गया। वह वासदेव का बेटा था। सूरजमल ने मुर्तजा खाँ से और बाद में शाह कुली खान एवं मोहम्मद तकी के साथ झगड़ा कर काँगड़ा किले पर कब्जे के अभियान को रद्द करवा दिया। सूरजमल ने मौके का फायदा उठा खुद काँगडा क्षेत्र पर कब्जा करना शुरू कर दिया। जहाँगीर ने सुंदरदास राय रैयन (विक्रमजीत) और सूरजमल के छोटे भाई जगत सिंह को सूरजमल के विद्रोह को दबाने भेजा। सूरजमल माओ किले में छिप गया फिर सूरजमल चम्बा भाग गया। सूरजमल को 1619 ई. में उसके भाई माधो सिंह के साथ पकड़कर मृत्युदण्ड दे दिया गया। जगत सिंह को नूरपुर का राजा बना दिया गया।

जगत सिंह (1619 -46 ई.) :

राजा जगत सिंह के समय जहाँगीर 1622 ई. में अपनी पत्नी के साथ धमेरी आया। जगत सिंह ने नूरजहाँ के सम्मान में धमेरी का नाम नूरपुर रखवाया। जगत सिंह ने 1623 ई. में डलोघ युद्ध में चम्बा के राजा जनार्दन को मारा और बलभद्र को अपनी पूरी निगरानी में राजा बनाया। बसौली के राजा भूपतपाल को गिरफ्तार कर जगतसिंह ने सबसे पहले 1614-15 में बसौली पर कब्जा किया।

जगत सिंह और उसके पुत्र राजरूप ने 1640 ई. में मुगलों के विरुद्ध विद्रोह किया जिसे दबाने के लिए शाहजहाँ ने मुरादबख्श को भेजा। जगत सिंह के काल में नूरपुर राज्य अपनी समृद्धि के शीर्ष पर था। वह नूरजहाँ को बेटी कहकर संबोधित करता था। 1641 ई. में मुगलों ने जगत सिंह से माओकोट, नूरपुर और तारागढ़ किले छीनकर कब्जा कर लिया। जगत सिंह और उसके पुत्र राजरूप सिंह को क्षमा कर दिया गया।

राजा जगत सिंह के नूरजहाँ से अच्छे संबंध थे इसलिए बेगम के कहने पर जहाँगीर ने जगत सिंह को क्षमा कर दिया। शाहजहाँ ने 1645 ई. में जगत सिंह को बदखशा (बलख) के उज्बेकों के विरुद्ध लड़ने के लिए भेजा। इस अभियान का नेतृत्व अमीर-उल-उमरा कर रहा था। जगत सिंह पंजाब के सूबेदार रियाज बेग के खिलाफ बने पहाड़ी राज्यों के परिसंघ से अलग रहा था।

राजरूप सिंह (1646-1661 ई.) :

शाहजहाँ ने जगत सिंह की मृत्यु के बाद राजरूप सिंह को बदखशां के अभियान में भेजी सेना का अध्यक्ष बनाया। राजरूप सिंह ने दारा शिकोह का साथ छोड़कर उत्तराधिकार युद्ध में औरंगजेब का साथ दिया। औरंगजेब ने उसे 3500 हजारी का मनसब और दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह का पीछा करने के लिए सेना देकर गढ़वाल भेजा।

मान्धाता (1661 -1700 ई.) :

राजा जगत सिंह की प्रशंसा में लिखी राजगाथा का आधा भाग मान्धाता द्वारा ही लिखा गया था। मुगलों की सहायता व प्रशंसा प्राप्त करने वाला मान्धाता आखिरी पठानिया राजा था। इनके शासनकाल में बाहु सिंह जो कि राजरूप सिंह का भाई था। उसने शाहपुर में मुगलों से जागीर प्राप्त कर राजधानी बनाई। 1686 ई. में भूपसिंह ने इस्लाम कबूल कर मुरीद खान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नूरपुर पर 1781 ई. में सिक्खों ने कब्जा कर लिया।

पृथ्वी सिंह (1753-1789 ई.) :

पृथ्वी सिंह के समय घमण्ड चंद, जस्सा सिंह रामगढ़िया, ने नूरपुर क्षेत्र पर कब्जा बनाये रखा। वर्ष 1785 ई. में नूरपुर रियासत लखनपुर के पास स्थानांतरित हो गई जो कि 1846 ई. तक वहीं रही।

वीर सिंह (1789-1846 ई.) :

राजा वीर सिंह नूरपुर रियासत पर शासन करने वाला अंतिम राजा था। वीर सिंह ने अपने राज्य पर महाराजा रणजीत सिंह का कब्जा होने के बाद जागीर लेने से इंकार कर दिया। नूरपुर और जसवां के राजा 1815 ई. के रणजीत सिंह के ‘स्यालकोट’ सैनिक सम्मेलन में नहीं गए थे।

वीर सिंह ने 1826 ई. में महाराजा रणजीत सिंह के विरुद्ध विद्रोह किया। वीर सिंह को पकड़कर रणजीत सिंह ने 7 वर्षों तक अमृतसर के गोविंदगढ़ किले में रखा जिसे बाद में चम्बा के राजा चरहट सिंह ने 85 हजार रुपये देकर छुड़वाया क्योंकि वीर सिंह उनका जीजा था। 1846 ई. में अंग्रेजों का नूरपुर पर कब्जा हो गया।

राजा वीर सिंह के पुत्र जसवन्त सिंह के समय नूरपुर रियासत के वजीर रामसिंह पठानिया ने 1848 ई. में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया। राम सिंह पठानिया को पकड़कर सिंगापुर भेज दिया गया जहाँ उसकी मृत्यु हो गई। जसवन्त सिंह ने 1857 ई. के विद्रोह में अंग्रेजों के प्रति वफादारी दिखाई थी।

बंघाहल रियासत

बंघाहल रियासत में बड़ा बंगाहल, छोटा बंघाहल, पपरोला, लंदोह और रजेड़ क्षेत्र शामिल थे। इस राज्य की राजधानी ‘बीड़ बंघाहल’ में एक बीड़ नामक स्थान पर थी। ऐतिहासिक तथ्यों की कमी के कारण इस रियासत की जानकारी बहुत कम प्राप्त हुई है।

कहते हैं कि इस रियासत की आधारशिला एक ब्राह्मण ने रखी थी और राज्य भार संभालने पर वह राजपूत कहलाया। इस रियासत के प्रारंभिक राजा ‘पाल’ उपसर्ग का प्रयोग करते थे जिनका संबंध ‘चंद्रवंशी’ वंश से था तथा पारिवारिक नाम ‘बन्धालिया’ लिखते थे।

बीड़ बंघाहल की भगौलिक स्थिति दुर्गम थी, इसकी सीमाएं कुल्लू, मण्डी, तथा काँगड़ा जैसे शक्तिशाली पडोसी राज्यों से लगती थी। 1240 ई. में सुकेत के राजा मदन सेन तथा 1554 ई. में मंडी के राजा साहिब सेन ने बंगाहल पर अधिकार किया था।

पृथ्वी पाल (1710-20 ) :

पृथ्वी पाल के समय इस रियासत की सबसे अधिक हानि हुई। मंडी के राजा सिद्ध सेन ने पृथ्वी पाल को धोखे से मंडी बुलाया और दमदमा महल में बंदी बनाकर वध कर दिया। उसके बाद रियासत पर अधिकार करने के लिए सेना भेजी। पृथ्वीपाल की माँ ने कुल्लू के राजा मान सिंह से सहायता मांगी। तब मंडी की सेना को पीछे हटना पड़ा। मान सिंह का विवाह पृथ्वी पाल की वहन से हुआ था।

रघु नाथ पाल ( 1720 ) :

पृथ्वीपाल की मृत्यु के बाद उसका पुत्र रघुनाथ पाल गद्दी पर बैठा। रघुनाथ पाल के समय मंडी के राजा सिद्ध सेन और शमशेर सेन ने उस पर आक्रमण किए लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 1735 ई. में रघुनाथ पाल की मृत्यु हुई।

दलेल पाल :

1735 में दलेल पाल गद्दी पर बैठा। एक संगठित आक्रमण जो मंडी , कुल्लू , कहलूर , नालागढ़ गुलेर तथा जसवां की सेनाओं ने बंगाहल पर किया था। इससे बंघाहल को भरी क्षति हुई। सन 1749 ई. में दलेल पाल की मृत्यु हो गई।

मान पाल :

सन 1749 ई. में मानपाल गद्दी पर बैठा। वह बान्घाहल का अंतिम राजा था। उसके पास अब केवल लंदोह, पपरोला और रजेड़ के क्षेत्र रह गए थे। उसकी मृत्यु दिल्ली जाते समय हुई और उसकी मृत्यु का समाचार सुनकर कांगड़ा और गुलेर के राजाओं ने मिलकर बंघाहल पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। लंदोह और पपरोला पर काँगड़ा तथा शेष भाग पर गुलेर का अधिकार हुआ।

इस प्रकार इस राज्य का अंत सन 1750 में हो गया। 1785 ई. में काँगड़ा के राजा संसार चंद ने मनिपाल की पुत्री से शादी कर बंघाहल के राजकुमार उचल पाल को सैनिक सहायता प्रदान की, जिससे कि वह मंडी रियासत से बंघाहल को आजाद करवा सके। लेकिन उचल पाल इसमें असमर्थ रहा।

|| History of District Kangra in Hindi – Himachal Pradesh || History of District Kangra in Hindi – Himachal Pradesh ||

Read Also : Geography of Himachal Pradesh

Leave a Reply