History of Himachal Pradesh – V

History of Himachal Pradesh – V
Important Questions for HPAS, NT, HPS Allied Services

  1. 5वें सावन, संवत 1866 को ( 20 जुलाई 1809 के करीब) महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसार चंद के बीच वह संधि कहां हुई थी जिससे कांगड़ा किला और जिला संधाता लाहौर सरकार को स्थानांतरित किया गए थे?
    A)अमृतसर
    B)लाहौर
    C)कांगड़ा
    D)ज्वालामुखी
    उतर-:D)ज्वालामुखी
    व्याख्या:- 1805-06 ईस्बी के करीब महल मोरिया में गोरखा आक्रमण के दौरान महाराजा संसार चंद को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। इस हार से महाराजा अपनी जान बचाने के लिए परिवार सहित कांगड़ा किले में पनाह लेकर बैठ गया। लेकिन गोरखा सेना सरदार अमर सिंह थापा के नेतृत्व में 3 वर्षों तक किले पर कब्जा कर पहरा लगाती रही। इस बात से परेशान होकर व खतरे से बचने के लिए संसार चंद ने सुजानपुर टीहरा के किले में शरण ले ली और वहां से सिखों के राजा महाराजा रणजीत सिंह को लाहौर संदेश भेजा कि वह गोरखा सेना से राजा की सहायता करें। 1 महीने की लंबी वार्ता के बाद दोनों के बीच ज्वालामुखी में 5वें सावन, संवत 1866 को ( 20 जुलाई 1809 के करीब) संधि हुई। संधि की शर्तों के अनुसार महाराजा ने कांगड़ा किला तथा 66 गांव का अधिकार महाराजा रणजीत सिंह को देना स्वीकार किया तत्पश्चात रंजीत सिंह ने गोरखो को कांगड़ा से भगाया व 20 अगस्त 1809 को कांगड़ा किले को अपने अधिकार क्षेत्र में लेकर देस्सा सिंह मिझिठीया को कांगड़ा किले का पहला सिख किलेदार नियुक्त किया व इसके पश्चात संसार चंद द्वितीय ने सुजानपुर टिहरा को अपनी स्थाई राजधानी बना दिया।
  2. भारत सरकार द्वारा जारी पत्र, दिनांक 8 फरवरी 1889 के द्वारा राज्यों का ब्रिटिश दरबार में बैठने का क्या क्रम था?
    A)सिरमौर, कहलूर, मंडी, बुशहर
    B)बुशहर, कहलूर, सिरमौर, मंडी
    C)मंडी, सिरमौर, कहलूर, बुशहर
    D)कहलूर, सिरमौर, कहलूर, बुशहर
    उतर-:C)मंडी, सिरमौर, कहलूर, बुशहर
    व्याख्या:- अधिकार के स्तर पर मंडी और सिरमौर दोनों को बराबर के स्तर पर रखा गया था। दोनों रियासतों के राजाओं को 11 तोपों की सलामी का अधिकार दिया गया था। शिमला दरबार में जब लॉर्ड एमहर्स्ट आये तो उन्होने सबसे आगे सिरमौर के राजा को सबसे आगे बिठाया था। लेकिन बाद में भारत सरकार द्वारा जारी पत्र, दिनांक 8 फरवरी 1889 के द्वारा ब्रिटिश दरबार में बैठने के वरीयता क्रम में सिरमौर को मंडी से पीछे रखा गया। इसके अलावा सुकेत और चंबा को भी 11 तोपों की सलामी का अधिकार था और दरबार में बैठने का वरीयता क्रम इनका बाकि राज्यों से आगे था। वंही बुशहर और कहलूर को सलामी का अधिकार नहीं था और वरीयता क्रम मे ये बाकी राज्यों से पीछे थे। पहाड़ी राजाओं ने 1877 के दिल्ली दरबार में भी हिस्सा लिया था। इस दरबार में लॉर्ड लिटन द्वारा हिमाचल की रियासतों से चंबा के राजा श्याम सिंह, मंडी के राजा बिजयी सेन व बिलासपुर के राजा हीराचंद का स्वागत किया गया था। 1911 में जब राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की जा रही थी तब ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के स्वागत में में दिल्ली दरबार की शोभा बढ़ाने के लिए हिमाचल की अलग-अलग रियासतों से राजाओं ने शिरकत की था। सिरमौर रियासत से राजा अमर प्रकाश, बिलासपुर से राजा अमरचंद, क्यूंथल से राजा विजय सेन, सुकेत से राजा भीम सेन, मंडी से राजा भवानी सेन, चंबा से राजा भूरी सिंह, बगाट से राणा दिलीप सिंह व जुब्बल से राणा भगत चंद्र ने भाग लिया था। इन सभी पहाड़ी राजाओं ने प्रथम विश्व युद्ध(1914-18) में अंग्रेजो की सैनिक व धन दोनों देकर सहायता भी की थी।
  3. 1815 में क्यूंथल के राजा को जारी की गई सनद के अनुसार किसे उसके अधिकार क्षेत्र में सौंपा गया था?
    A)ठयोग और घुंड
    B)कियारी और बलसंन
    C)घुंड और दारकोटी
    D)मधान और खनेटी
    उतर-:A)ठयोग और घुंड
    व्याख्या:- 1815 में हुए ब्रिटिश-गोरखा युद्ध के बाद पहाड़ी राज्यों की सीमाएं निर्धारित करने व इन्हें अपने नियंत्रण में लेने के लिए जनरल ऑक्टरलोनी द्वारा पालसी में पहाड़ी राजाओं की एक मीटिंग बुलाई गई। यंहा बिलासपुर, कोटखाई , बाघल और बुशहर आदि राजाओं ने ब्रिटिश सत्ता की प्रभुसत्ता स्वीकार की। तत्पश्चात इन्हें ब्रिटिश द्वारा 1815 से 1819 के बीच सनद जारी कर स्वतंत्र रूप से शासन करने की अनुमति दी गई।
    कुमारसेन, बलसन, थरोच, कुठार, मांगल व धामी आदि ठाकुराइयों को स्वतंत्र रूप से शासन चलाने के लिए सनदे जारी की गई।
    1815 में क्योंथल को एक सनद जारी कर कोटी, मधान, रतेश, ठयोग और घुंड आदि ठाकुराइयों को क्यूंथल के अधिकार क्षेत्र में सौंपा गया।वहीं 1816 में बुशहर को सनद जारी कर दारकोटी और खनेटी ठाकुराइयों को बुशहर के अधिकार क्षेत्र में सौंपा गया।
    सनद(Sanad):सनद एक तरह अंग्रेजों का पहाड़ी राजाओं के लिए लिखित आज्ञा पत्र, जिसे एक तरह का समझौता पत्र भी माना जा सकता था। इसके माध्यम से राजाओं के अधिकार और कर्तव्य तय किए जाते थे तथा राज्यों की सीमा निर्धारित की जाती थी। इसके माध्यम से ही राज्य की सीमाओं को बढ़ाया व घटाया जा सकता था। एक रियासत का अधिकार क्षेत्र किसी दूसरी रियासत को भी प्रदान किया जा सकता था। सनदों के माध्यम से ही राजाओं को कुछ कार्य भी सौंपे जाते थे। अगर वे इन कार्यो को पूरा करने में असमर्थ रहते थे तो अंग्रजों द्वारा उन्हें प्रदान किए गए अनुदान में कमी की जाती थी या अनुदान पूरी तरह से बंद कर दिया जाता था। इसलिए पहाड़ी राजा सनद में दी गई शर्तों को पूरा करने के लिए बाध्य थे। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते तो उनको उनके अधिकारों से वंचित किया जाता था।
    सनदो के अंतर्गत पहाड़ी रियासतों को अंग्रेजी रक्षा के बदले कुछ शर्तों का पालन करना आवश्यक बना दिया गया था। शर्तों के अनुसार उन्हें ब्रिटिश व्यपारियों और सामान को अपने राज्य से निःशुल्क गुजरने का अधिकार देना पड़ता था और जरुरत के अनुसार बेगार भी प्रदान करनी पड़ती थी। उन्हें अपने राज्य में 12 फुट चौड़ी सड़क बनना आवशक कर दिया गया।युध्द के समय अंग्रेजों को सैनिक सहायता देना भी आवशक कर दिया।राजाओं को अपने यहां शासन व्यवस्था एवम कृषि व्यवस्था मे सुधार करने के लिये कहा गया । यह भी आदेश दिया गया की लोंगो की शिकायते दूर करें तथा सार्वजनिक सड़कों को सुरक्षित बनाएं।
  4. सिरमौर के किस राजा ने अपनी राजधानी कलसी से राजपुर बदल दी थी?
    A)कर्म प्रकाश
    B)रतन प्रकाश
    C)सूरज प्रकाश
    D)बुद्धि प्रकाश
    उतर-:D)बुद्धि प्रकाश
    व्याख्या:- सिरमौर की स्थापना के संदर्भ में इतिहासकारों का एकमत नहीं है। एक कहावत के अनुसार सिरमौर राज्य की स्थापना राजा रसालू द्वारा की गई थी और उसने अपनी राजधानी गिरी नदी के किनारे सिमरी ताल को बनाया था जो एक नटी के शाप से बरसात की वजह से तबाह हो गई थी। तत्पश्चात 1100 ईस्बी के करीब राज्य में शासक की कमी देखते हुए जैसलमेर के राजा शोभा रावल ने राजवन में अपनी राजधानी स्थापित की व अपना नाम भी बदलकर शुभम प्रकाश कर दिया। अपनी विजय के उपलक्ष्य पर उसने भागीरथी नदी के किनारे लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण भी करवाया। तत्पश्चात 1217 ईस्बी के करीब इसी रियासत के राजा उदित प्रकाश ने राजधानी राजवन से कलसी स्थानांतरित की। उदित प्रकाश के बाद कोल प्रकाश ने राज्य की बागडोर संभाली और जुब्बल, बलसन तथा थरोच को अपने अधिकार क्षेत्र में लिया। तत्पश्चात 1610 ईस्बी के करीब राजा बुद्धि प्रकाश द्वारा राजधानी कलसी से राजपुरा बदली गई। राजपुरा से भी राजधानी स्थानांतरित करने का विचार कर्म प्रकाश के दिमाग में आया और राजा कर्म प्रकाश द्वारा 1620 के करीब राजधानी नाहन में स्थापित की गई।
  5. मंडी रियासत का कौन सा क्रांतिकारी नेता 1914-15 के मंडी षड्यंत्र केस से भागकर बद्रीनाथ पहुंचा और अपना नाम बदलकर स्वामी कृष्णानंद कर दिया?
    A)हरदेव
    B)मियां जवाहर सिंह
    C)मियां जवाहर सिंह
    D)डॉक्टर मथुरादास
    उतर-:A)हरदेव
    व्याख्या:- 1914-15 का मंडी षड्यंत्र गदर पार्टी से प्रेरित था। मंडी षड्यंत्र को अंजाम देने वाले क्रांतिकारियों का नेतृत्व मंडी की रानी खैरागड़ी व मियां जवाहर सिंह कर रहे थे।इनके संपर्क में गदर के अन्य कार्यकर्ता जिनमें हरदेव और भाई हृदयाराम आदि भी शामिल थे। जैसे गदर पार्टी से संबंधित क्रांतिकारियों का लक्ष्य भ्रष्ट अधिकारियों की हत्या करना व साधन जुटाने के लिए डाके ड़ालना व शस्त्रागारों पर हमला करना आदि शामिल था उसी तरह से इनका भी लक्ष्य अंग्रेजों द्वारा मंडी रियासत में नियुक्त वजीर जीवा पधा राम को सत्ता से उखाड़ फेंकना, अधीक्षक को मार गिराना व खजाना लूटना था।
    लेकिन अधीक्षक व अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को क्रांतिकारियों की खुफिया जानकारी मिलने के बाद ये नागचला डकैती के सिबया बाकी योजनाओं को अंजाम नहीं दे सके। बहुत से क्रांतिकारियों को नागचला डकैती के आरोप में सजा दी गई। भाई हृदयाराम को लाहौर षड्यंत्र मामले में पकड़ा गया व उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई लेकिन बाद में उनकी सजा को उम्रकैद में बदला गया। वहीं हरदेव बद्रीनाथ चले गए और वहां पर अपना नाम बदलकर स्वामी कृष्णानंद बनकर कांग्रेस में शामिल हो गए।
  6. कांगड़ा के किस राजा को नोखू नामक एक गद्न से प्यार हो गया था?
    A) संसार चंद
    B) अनिरुद्ध चंद
    C) रणवीर चंद
    D) घमंड चंद
    उतर-:A) संसार चंद
    व्याख्या:- संसार चंद त्रिगर्त रियासत का एक महान शासक था जिसकी सभी पहाड़ी राज्यों को अपने अधिकार क्षेत्र में लेकर एक विशाल साम्राज्य स्थापित करने की प्रबल इच्छा थी। ये साहित्य व कला के बहुत समर्थक थे इनके शासनकाल में कांगड़ा चित्रकला का काफी विकास हुआ।इन्हे नोखू नामक एक गदन से प्यार हो गया था जिसे आज भी कांगड़ा के स्थानीय लोक गीतों में याद किया जाता है।
  7. सिरमौर के उस स्थान की पहचान करें जहां गोरखों और अंग्रेजो के बीच महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ी गई थी?
    A) जातक पहाड़िया
    B) हरिपुर धार
    C) रामपुर घाट
    D) चूड़धार
    उतर-:A) जातक पहाड़िया
    व्याख्या:- गोरखो और अंग्रेजो के बीच चार अलग-अलग क्षेत्रों में चार अलग-अलग सेनापतियों के नेतृत्व में युद्ध हुआ था। जिनमें एक क्षेत्र सिरमौर के नजदीक जातक की पहाड़ियां थी। इन पहाड़ियों के मध्य गोरखो ने जातक का किला बना रखा था। रणजोर सिंह थापा किले में गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहा था वहीं दूसरी तरफ जाताक किले पर आक्रमण करने के लिए पहुंची ब्रिटिश सेना का नेतृत्व मेजर मार्टिनलेंड कर रहा था। इसमें ब्रिटिश सेना को जीत मिली थी।
    वहीं दूसरी तरफ देहरादून तथा क्यरादून के मध्य बसे कालापानी के नजदीक बाल बहादुर थापा गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहा था। जबकि ब्रिटिश सेना की कमान रोलो गेल्स्पि के हाथों में थी। इस युद्ध के पश्चात अंग्रेज अधिकारी रोलो गेल्स्पि बुरी तरह घायल हुआ था और अंतत: उसकी मृत्यु हो गई थी। लेकिन इसमें ब्रिटिश सेना को जीत मिली थी।
    वही तीसरी तरफ रामपुर और जुब्बल क्षेत्रों में गोरखा सेना का नेतृत्व रणसोर थापा और कीर्ति राणा कर रहे थे। जबकि अंग्रेजी सेना की कमान बिल्लियम फ्रेजर ने संभाला हुई थी। इन क्षेत्रों में भी गोरखा सेना की हार हुई।
    इसके अलावा नालागढ़ के नजदीक रामगढ़ के किले में गोरखा सेना की कमान गोरखा सरदार अमर सिंह थापा संभाले हुए थे। वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश सेना की कमान मेजर अख्तरलोनी के हाथों में थी जिनका साथ नालागढ़ और बिलासपुर के राजा भी दे रहे थे। यहां पर भी गोरखों की हार हुई। अंततः सभी मोर्चों पर परास्त हो जाने के बाद अंग्रेजों ने नेपाल के राजा से 1815 में संजौली शिमला में संधि कर ली। संधि की शर्तों की अनुपालन अनुसार अमर सिंह थापा ने अपने अधिकार में पड़ने वाले सभी पहाड़ी क्षेत्र अंग्रेज अधिकारी मेजर अख्तरलोनी को सौंप दिए।
  8. बघाट रियासत के किस राजा ने कालका-शिमला रेल लाइन के लिए तथा सोलन व कसौली सैनिक छवनीयों के लिए अंग्रेजों को भूमि सुपुर्द की थी?
    A) ईश्वरी सिंह
    B) केश्वींदेर सिंह
    C) दुर्गा सिंह
    D) दिलीप सिंह
    उतर-:D) दिलीप सिंह
    व्याख्या:- बघाट एक छोटी सी रियासत थी जिसकी स्थापना दक्षिण भारत से आए राजपूत शासक बसंत पाल ने की थी जिसे कई बार हरिचंद पाल के नाम से भी जाना गया है।बघाट को यह नाम इंद्रपाल द्वारा दिया गया था जो 1948 तक बना रहा।
    बाघाट अपनी स्थापना के बाद अधिकतर बिलासपुर के अधिकार क्षेत्र में ही रही। बिलासपुर से 1790 ईस्बी के आसपास इसे राणा जनमैं पाल द्वारा छुड़ाया गया। गोरखा आक्रमण व उनके 12 सालों के शासन के दौरान रियासत का राजा महेंद्र सिंह बिना किसी हस्तक्षेप के अपना शासन करता रहा क्योंकि गोरखा सरदार अमर सिंह थापा के साथ इनके बहुत अच्छे संबंध थे। इसी कारणवश अंग्रेजों ने भी बाघाट के राजा के 6 परगाने पटियाला के राजा को बेचकर 1 लाख की आय प्राप्त की थी बाघाट के राणा का अधिकार क्षेत्र कम कर दिया था। बाघाट के राजा राणा महेंद्र सिंह की बिना औलाद के मृत्यु हो जाने के बाद लॉर्ड डलहौजी द्वारा 1849 में बाघाट को विलय की नीति के अंतर्गत अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाया गया था।
    विलय की नीति के अंतर्गत ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित होने वाली यह हिमाचल की पहली रियासत थी। लेकिन बाद में 1860 ईस्बी में लॉर्ड कैनिंग द्वारा बघाट के उत्तराधिकारी उमेद सिंह का दावा स्वीकार कर उसे रियासत का राणा बनाया गया। उमेद सिंह सिंह की मृत्यु के बाद उसका अव्यस्क पुत्र दलीप सिंह राज गद्दी पर बैठा और उसे अंग्रेजों द्वारा 1862 में एक सनद जारी कर राज्य के सभी अधिकार दिए गए साथ में उसे 2000 का वार्षिक हरजाना लेना तय किया। 1901 में राणा दिलीप सिंह से ही अंग्रेजों ने कालका शिमला रेल लाइन के निर्माण के लिए भूमि अधिकृत की तथा ही सोलन के नजदीक कसौली में, सुबाथू मे तथा डगशाई में जमीन अधिकृत कर सैनिक छावनीयों को स्थापित करने का कार्य पूरा किया।1928 बघाट के राणा दुर्गा सिंह को अंग्रेजों द्वारा राजा की उपाधि दी गई। आजादी के बाद 1948 में हिमाचल के निर्माण संदर्भ में बुलाई गई सभा की अध्यक्षता भी बघाट राजा दुर्गा सिंह द्वारा ही की गई थी।
  9. कांगड़ा जिले के किस गांव में जस्टिस मेहर चंद महाजन का जन्म हुआ था?
    A) नगरोटा बगवां
    B) नगरोटा सूरियां
    C) नगरोटा खिन्डरी
    D) नगरोटा वग
    उतर-:C) नगरोटा खिन्डरी
    व्याख्या:- जस्टिस मेंहर चंद महाजन का जन्म हिमाचल के टिवका नगरोटा खिन्डरी, जिला कांगड़ा में हुआ था। इनको इनके जन्म के समय पिता के लिए अशुभ माना गया था और इनका पिता द्वारा त्याग कर दिया गया था। लेकिन बाद में पिता द्वारा इस संबध में ज्योतिषियों से फिर से विचार करने को कहा गया तो उन्होंने बताया कि यह लड़का परिवार के लिए बहुत ही भाग्यशाली है। तत्पश्चात इन्हें फिर से कांगडा लाया गया और इनकी पढाई आर्य स्कूल धर्मशाला से हुईं। लाहौर सै 1905 में इन्होंनै मैट्रिक क्री परीक्षा पास की। भारत पाकिस्तान विभाजन के बाद इदृहैं कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया गया। 1948 में इन्हे बीकानेर राज्य का संवैधानिक सलाहकार भी बनाया गया। 1954 इन्हे भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया । “लुकिंग बेक” इनकी आत्मकथा का नाम है ।
  10. राणा पुर्ण चंद द्वारा अंग्रेजों को बेगार न जुटा पाने के लिए गद्दी से हटा दिया गया था, इनका संबंध निम्न में से कौन से ठाकुराई से था?
    A) जुब्बल
    B) ठयोग
    C) घुंड
    D) बलसंन
    उतर-:A) जुब्बल
    व्याख्या:- जुब्बल के राणा पुर्ण चंद द्वारा अंग्रेजों को बेगार न जुटा पाने के लिए उसे गद्दी से हटाकर उसकी जगह डांगी वजीर को राजा बना दिया। डांगी वजीर की भी शीघ्र मृत्यु हो गई उसके बाद अंग्रेजों को फिर से हस्तक्षेप करना पड़ा और राज्य के प्रशासनिक कार्यों के लिए तहसीलदार की नियुक्ति की गई।तहसीलदार के बाद 1854 में अंग्रेजों द्वारा एक सनद जारी करके कर्म चंद को रियासत का राणा नियुक्त किया गया ।कर्म चंद एक कठोर और दमनकारी शासक था इसने कई बार जनता को लूटा उनसे दो-तीन गुना बेगार ली अंत में इसका अंग्रेजों के साथ झगड़ा हो गया और इसे राजगद्दी से हटा दिया गया।
  11. सर्वप्रथम 1934 में किसके द्वारा हिमाचल में प्रजामंडल की स्थापना की गई थी?
    A) डॉक्टर देवेंद्र सिंह
    B) चौधरी शेरजंग
    C) शिवानंद रमोल
    D) यशवंत सिंह परमार
    उतर-:A) डॉक्टर देवेंद्र सिंह
    व्याख्या:- सर्वप्रथम 1934 में डॉक्टर देवेंद्र सिंह द्वारा सिरमौर प्रजामंडल की स्थापना की गई। जिस की बागडोर 1937 में पहाड़ों के राजनीतिक गुरु माने जाने वाले चौधरी शेरजंग द्वारा संभाली गई शिवानंद रमोल और डॉ यशवंत सिंह परमार उनके सहयोगी थे।

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